Business News: टाटा समूह को नियंत्रित करने वाली मुख्य संस्था टाटा ट्रस्ट ने इस चालू वित्त वर्ष में जनकल्याण कार्यों के लिए अपना खजाना खोल दिया है। ट्रस्ट इस साल समाज सेवा के कार्यों पर लगभग 2,000 करोड़ रुपये खर्च करने जा रहा है। पिछले साल यह राशि 1,600 करोड़ रुपये थी।
संस्था के सीईओ सिद्धार्थ शर्मा ने इंटरनेट मीडिया पर इसकी आधिकारिक पुष्टि की है। उन्होंने टाटा ट्रस्ट में चल रहे आंतरिक विवादों और अराजकता की खबरों को पूरी तरह सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि मीडिया में चल रही ऐसी खबरें महज रेटिंग बटोरने का जरिया हैं।
कैंसर इलाज से लेकर शिक्षा और रिसर्च पर बड़ा फोकस
करीब 17.1 लाख करोड़ रुपये से अधिक की वैल्यूएशन वाले टाटा ग्रुप को नियंत्रित करने वाले इस ट्रस्ट को टाटा संस से मिलने वाले लाभांश से यह फंड मिलता है। इस बड़े फंड के जरिए ट्रस्ट देश के विकास और स्वास्थ्य क्षेत्र में कई बड़े और ऐतिहासिक बदलाव कर रहा है।
ट्रस्ट द्वारा असम, झारखंड, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश में बेहद किफायती दरों पर उत्कृष्ट कैंसर इलाज प्रदान किया जा रहा है। इसके साथ ही ट्रस्ट स्नातक स्तर की शिक्षा के लिए एक विश्व स्तरीय विश्वविद्यालय स्थापित करने और मध्य भारत में मल्टी-स्पेशलिटी अस्पताल बनाने की योजना पर काम कर रहा है।
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तकनीकी और वैज्ञानिक अनुसंधान को वित्तीय मदद
कृषि और जीनोमिक्स में उच्च स्तरीय रिसर्च के अलावा ट्रस्ट कई बड़े संस्थानों की मदद कर रहा है। इसके तहत आईआईटी मंडी में ‘आपदा तैयारी और लचीलापन केंद्र’ स्थापित हो रहा है। वहीं आईआईटी मद्रास में ‘मस्तिष्क अनुसंधान’ को आगे बढ़ाने के लिए बड़ी वित्तीय मदद दी जा रही है।
दरअसल, टाटा संस में 66 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाले टाटा ट्रस्ट में पिछले कुछ समय से तनाव की खबरें बनी हुई हैं। स्थिति यहां तक पहुंच गई थी कि इस मामले में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के हस्तक्षेप तक की बातें उठने लगी थीं।
क्या है पूरा विवाद और आरबीआई का सख्त नियम?
इस विवाद की मुख्य वजह टाटा संस को शेयर बाजार में सूचीबद्ध कराने का बढ़ता दबाव है। भारतीय रिजर्व बैंक के सख्त नियमों के अनुसार, टाटा संस को अपर लेयर एनबीएफसी श्रेणी में रखा गया है। इसके कारण कंपनी के लिए शेयर बाजार में लिस्ट होना कानूनी रूप से बेहद जरूरी हो गया है।
आरबीआई की नई नीति के मुताबिक, 1,000 करोड़ रुपये से बड़े गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थानों के लिए शेयर बाजार में लिस्ट होना पूरी तरह अनिवार्य है। इसमें छूट का कोई रास्ता नहीं है। इसी लिस्टिंग को लेकर ट्रस्ट के भीतर मतभेद की खबरें थीं, जिस पर अब सीईओ ने विराम लगाया है।
Author: Rajesh Kumar


