Mumbai News: भारतीय समाज में पारंपरिक रूप से एक सुरक्षित और मूल्यवान धरोहर माना जाने वाला सोना इन दिनों घरेलू सर्राफा बाजार में जबरदस्त उतार-चढ़ाव के दौर से गुजर रहा है। पिछले कुछ समय में रिकॉर्ड ऊंचाई छूने के बाद अब इसकी कीमतों में अचानक एक बड़ी गिरावट देखी जा रही है।
हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल 2025 में पहली बार 24 कैरेट गोल्ड का रेट एक लाख रुपये प्रति दस ग्राम के पार चला गया था। इसके बाद साल 2026 में इसने डेढ़ लाख का ऐतिहासिक आंकड़ा भी पार कर लिया। हालांकि, मौजूदा समय में मुनाफावसूली के चलते यह डेढ़ लाख के स्तर से थोड़ा नीचे आ गया है।
1950 से लेकर अब तक सोने का ऐतिहासिक सफर
भारत में वर्ष 1950 से 1960 के दशक के दौरान सोने की कीमतें काफी ज्यादा स्थिर थीं और यह लगभग 100 से 120 रुपये प्रति दस ग्राम के बीच बिक रहा था। इसके बाद वर्ष 1970 के दशक में वैश्विक तेल संकट और भयंकर महंगाई के कारण कीमतें पहली बार 900 रुपये के पार पहुंच गईं।
इसके बाद वर्ष 1991 के आर्थिक संकट और भारतीय रुपये के अवमूल्यन (Devaluation) से सोना सीधे 4,000 रुपये के पार चला गया। वर्ष 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी के बाद सुरक्षित निवेश (Safe Haven) के रूप में इसकी मांग तेजी से बढ़ी और भाव 18,000 रुपये के स्तर तक उछल गए।
वर्ष 2020 में आई वैश्विक कोविड-19 महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध और इंटरनेशनल मार्केट में बढ़े भारी दबाव की वजह से सोना 56,200 रुपये से बढ़कर सीधे 70,000 रुपये के पार चला गया था। इसके बाद मजबूत ग्लोबल संकेतों के कारण 22 अप्रैल 2025 को इसने एक लाख का आंकड़ा पार किया।
ग्लोबल मार्केट के इन कारणों से बढ़े थे दाम
फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स के अनुसार, रूस के फॉरेन करेंसी रिजर्व को फ्रीज किए जाने और चीन द्वारा भारी मात्रा में सोने की खरीदारी से इसकी कीमतें अचानक बढ़ी थीं। इसके साथ ही भारत द्वारा बैंक ऑफ इंग्लैंड से अपना 100 टन सोना वापस देश लाने के फैसले ने भी बड़ा असर डाला।
ग्लोबल बुलियन पार्टनर्स के चीफ एग्जीक्यूटिव का कहना है कि भू-राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक अनिश्चितता के कारण निवेशकों ने इसे एक सुरक्षित ठिकाने के रूप में चुना था। हालांकि, मार्च महीने की शुरुआत से अब तक सोने की कीमतों में करीब 28 प्रतिशत तक की बड़ी गिरावट आ चुकी है।
मुनाफावसूली और डॉलर की मजबूती से गिरी कीमतें
मार्केट एक्सपर्ट्स के मुताबिक, सोने की कीमतों में गिरावट का सबसे बड़ा कारण यह है कि बड़े निवेशकों ने भारी प्रॉफिट कमाने के बाद अपनी होल्डिंग्स को बेचना शुरू कर दिया। इस बिकवाली से बाजार में एक ‘डोमिनो इफेक्ट’ शुरू हुआ, जिससे कीमतें लगातार नीचे की तरफ आने लगीं।
इसके अलावा दुनिया भर के सेंट्रल बैंकों द्वारा ब्याज दरें बढ़ाए जाने की उम्मीद से भी सोने का आकर्षण थोड़ा कम हुआ है। चूंकि सोने से कोई फिक्स्ड रेगुलर इनकम नहीं होती, इसलिए ब्याज दरें ज्यादा होने पर आम निवेशक कैश और सरकारी बॉन्ड्स की तरफ तेजी से शिफ्ट होने लगते हैं।
इंटरनेशनल मार्केट में अमेरिकी डॉलर का लगातार मजबूत होना भी सोने के लिए नुकसानदेह साबित हुआ है। डॉलर के मजबूत होने से विदेशी खरीदारों के लिए सोना खरीदना काफी महंगा हो जाता है, जिससे इसकी ओवरऑल डिमांड घटती है। हालांकि, मौजूदा भू-राजनीतिक तनाव ने इसे बहुत ज्यादा गिरने से रोका है।
रिटेल निवेशकों को एक्सपर्ट्स ने दी यह सलाह
चार्ल्स स्टेनली डायरेक्ट के चीफ एनालिस्ट के मुताबिक, शॉर्ट टर्म के लिए सोना बिल्कुल भी सुरक्षित निवेश नहीं है। यह अपनी वास्तविक वैल्यू को लंबे समय तक बनाए रखता है, लेकिन इसके लिए आपको महीनों या सालों के बजाय कम से कम दशकों के नजरिए से सोचना होगा।
मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि जिन रिटेल निवेशकों ने केवल शॉर्ट टर्म प्रॉफिट कमाने के लिए सोना खरीदा था, वे मौजूदा गिरावट से घबराएं नहीं। अगर आपके पास लंबे समय का समय है, तो अपने पोर्टफोलियो को डायवर्सिफाई करने के लिए इस कम कीमत पर और सोना खरीदना एक बेहतर फैसला हो सकता है।
कम समय में कमोडिटी मार्केट का सटीक अंदाजा लगाना बेहद मुश्किल होता है। इसलिए जानकारों की सलाह है कि जोखिम से पूरी तरह बचने और अपनी कैपिटल सुरक्षा के लिए हर निवेशक को अपने कुल पोर्टफोलियो का कम से कम 5 प्रतिशत हिस्सा सोने में जरूर निवेश करके रखना चाहिए।

