वैश्विक चीनी बाजार में बड़ा संकट, भारत अगले कुछ सालों तक निर्यात से पूरी तरह रह सकता है बाहर

New Delhi: वैश्विक चीनी बाजार को आने वाले दिनों में एक बड़ा झटका लग सकता है। भारत अगले कई सालों तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी निर्यात से लगभग बाहर रहने वाला है। इससे दुनियाभर में मीठे का संकट गहराने की पूरी आशंका पैदा हो गई है। वैश्विक स्तर पर सप्लाई चेन पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है।

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कमजोर मानसून और इथेनॉल नीति ने बिगाड़ा खेल

मौसम विशेषज्ञों के अनुसार अल नीनो के कारण इस बार देश में मानसून कमजोर रहने का अनुमान है। इस वजह से गन्ने की खेती और बुवाई पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है। पानी की कमी के कारण उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है। इससे घरेलू बाजार के साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी हलचल तेज हो गई है।

भारत सरकार का मुख्य ध्यान इस समय देश में तेजी से बढ़ते इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम पर है। सरकार पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा बढ़ाने के लिए गन्ने के रस का इस्तेमाल बढ़ा रही है। यही वजह है कि मिलें अब चीनी बनाने के बजाय ईंधन बनाने को प्राथमिकता दे रही हैं। इससे चीनी की उपलब्धता बहुत कम हो गई है।

घरेलू बाजार में मांग ज्यादा और उत्पादन बहुत कम

आंकड़ों के मुताबिक भारत में इस सीजन में चीनी का कुल उत्पादन लगभग 27.9 मिलियन टन रहने की उम्मीद है। इसके मुकाबले देश के भीतर चीनी की घरेलू खपत 28.5 मिलियन टन के करीब पहुंच सकती है। इसका सीधा मतलब है कि देश में उत्पादन कम और मांग ज्यादा रहने वाली है।

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पहले भारत हर साल औसतन 6.8 मिलियन टन चीनी दूसरे देशों को निर्यात करता था। अब यह आंकड़ा घटकर सिर्फ 8 लाख टन तक सिमट गया है। देश का चीनी सरप्लस बहुत तेजी से खत्म हो रहा है। इसके चलते चीनी का सरकारी स्टॉक ऐतिहासिक रूप से अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच सकता है।

साल 2027 तक चीनी आयात करने की आ सकती है नौबत

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मौजूदा हालात नहीं सुधरे तो भारत को साल 2027-28 तक चीनी आयात करनी पड़ सकती है। पिछले एक दशक में ऐसा पहली बार होगा जब देश को चीनी मंगवानी पड़ेगी। सरकार ने स्थानीय कीमतों को काबू में रखने के लिए साल 2026 तक निर्यात पर पूरी रोक लगा दी है।

भारत के इस बड़े फैसले का सीधा असर एशिया, अफ्रीका और मिडल ईस्ट के आयातक देशों पर पड़ेगा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी की किल्लत होने से इसकी कीमतों में भारी उछाल आना तय है। अल नीनो की मार और ईंधन नीति ने मिलकर पूरी दुनिया के व्यापारिक समीकरण को बदल कर रख दिया है।

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