नीतीश कुमार की विदाई और सम्राट चौधरी का राजतिलक: 34 साल के संघर्ष से कैसे ‘राकेश’ बने बिहार के किंग?

Bihar News: बिहार की राजनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिला है। दो दशकों तक सत्ता के शीर्ष पर रहने वाले नीतीश कुमार दिल्ली रवाना हो गए हैं। भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार राज्य में अपना मुख्यमंत्री बनाया है। पार्टी ने मौजूदा डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी को यह अहम जिम्मेदारी सौंपी है। यह फैसला राज्य की सियासत में नए युग की शुरुआत माना जा रहा है। बीजेपी ने अपने दम पर बिहार में सरकार बनाकर एक नया इतिहास रच दिया है।

राजनीतिक विरासत और सम्राट चौधरी का शुरुआती जीवन

नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का मूल नाम राकेश कुमार है। उनका जन्म सोलह नवंबर उन्नीस सौ अड़सठ को मुंगेर के लखनपुर गांव में हुआ था। उन्हें राजनीति अपने परिवार से विरासत में मिली है। उनके पिता शकुनी चौधरी एक दिग्गज नेता हैं। वह सात बार विधायक और सांसद का चुनाव जीत चुके हैं। सम्राट की माता पार्वती देवी भी विधायक के रूप में काम कर चुकी हैं। मदुरै कामराज विश्वविद्यालय से सम्राट ने अपनी उच्च शिक्षा पूरी की है।

उन्नीस सौ नब्बे से शुरू हुआ कड़ा राजनीतिक सफर

सम्राट चौधरी ने साल उन्नीस सौ नब्बे में सक्रिय राजनीति में कदम रखा था। उन्होंने उन्नीस मई उन्नीस सौ निन्यानवे को पहली बार मंत्री पद की शपथ ली। उस समय उन्हें राबड़ी देवी सरकार में कृषि मंत्री बनाया गया था। इसके बाद उन्होंने साल दो हजार और दो हजार दस में परबत्ता विधानसभा क्षेत्र से शानदार जीत दर्ज की। साल दो हजार दस में उन्हें बिहार विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल का अहम सचेतक भी नियुक्त किया गया था।

अलग-अलग सरकारों में कई अहम मंत्रालयों की संभाली जिम्मेदारी

राजनीति के इस लंबे सफर में सम्राट ने कई बड़े पद संभाले हैं। दो जून दो हजार चौदह को उन्होंने जीतन राम मांझी सरकार में अहम भूमिका निभाई। तब उन्होंने शहरी विकास और स्वास्थ्य मंत्री के रूप में कार्यभार संभाला था। इसके बाद साल दो हजार इक्कीस में भी उन्हें बड़ी जिम्मेदारी मिली। नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल विस्तार में उन्हें भाजपा कोटे से पंचायती राज मंत्री बनाया गया था। उन्होंने हर विभाग में अपना प्रभावशाली काम करके दिखाया है।

बीजेपी के साथ शानदार सफर और मुख्यमंत्री पद का ताज

राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल यूनाइटेड के बाद सम्राट ने नई राह चुनी। साल दो हजार अठारह में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया। पार्टी ने उन्हें जल्द ही प्रदेश उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंप दी। मार्च दो हजार तेईस से जुलाई दो हजार चौबीस तक वह प्रदेश अध्यक्ष रहे। साल दो हजार पच्चीस में उन्होंने तारापुर से चुनाव जीता। केवल आठ सालों की कड़ी मेहनत के बाद बीजेपी ने उन्हें मुख्यमंत्री पद का बड़ा इनाम दिया है।

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