सबरीमाला मंदिर विवाद: क्या अंधविश्वास तय करेगी अदालत? सुप्रीम कोर्ट की वो टिप्पणी जिसने सती और नरबलि की याद दिला दी

India News: सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम और बड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने साफ कर दिया है कि धार्मिक प्रथाओं में अंधविश्वास है या नहीं, इसकी समीक्षा करने का पूरा अधिकार न्यायपालिका के पास है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि ऐसे संवेदनशील मामलों में सिर्फ सरकारों का फैसला ही अंतिम नहीं माना जा सकता है। अदालत धर्म की आड़ में छिपे अंधविश्वासों पर भी कड़ा एक्शन ले सकती है।

सती और नरबलि का सुप्रीम कोर्ट में क्यों हुआ जिक्र?

मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस अहम मामले पर विस्तार से सुनवाई की। यह मामला सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को चुनौती देता है। पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि अदालत अंधविश्वास तय कर सकती है। न्यायालय ने पुराने समय का उदाहरण दिया। जजों ने कहा कि जादू-टोना, नरबलि, नरभक्षण और सती जैसी अमानवीय प्रथाएं पहले समाज में थीं। इन्हें बाद में असंवैधानिक और क्रूर मानकर हमेशा के लिए खत्म किया गया।

क्या अदालत तय कर सकती है धर्म और अंधविश्वास?

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार का पक्ष मजबूती से रखा। उन्होंने अदालत में तर्क दिया कि एक धर्मनिरपेक्ष अदालत धार्मिक प्रथाओं में सीधा दखल नहीं दे सकती। उनका मानना है कि अदालत के पास धर्म का विद्वत्तापूर्ण ज्ञान नहीं होता है। उन्होंने कहा कि भारत विविधताओं से भरा एक विशाल देश है। यहां जो परंपरा एक स्थान पर पूरी तरह धार्मिक मानी जाती है, वही परंपरा दूसरे स्थान पर अंधविश्वास भी कहला सकती है।

जजों ने सरकार से पूछे तीखे और सीधे सवाल

जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सरकार से कड़े सवाल किए। उन्होंने पूछा कि अगर कोई जादू-टोना को धार्मिक प्रथा बताए और सरकार चुप रहे, तो क्या अदालत तब भी दखल नहीं देगी? सॉलिसिटर जनरल ने इस पर अपना अहम जवाब दिया। उन्होंने माना कि सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के आधार पर अदालत जरूर हस्तक्षेप कर सकती है। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि सिर्फ अंधविश्वास का हवाला देकर अदालत को सीधा हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए।

अदालत की भूमिका को पूरी तरह सीमित नहीं किया जा सकता

जस्टिस एमएम सुंदरश और जस्टिस बीवी नागरत्ना ने अदालत की शक्तियों पर बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी स्थिति में अदालत की भूमिका को सीमित नहीं किया जा सकता। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि धार्मिक परंपरा की अहमियत की समीक्षा उसी धर्म के दर्शन से होनी चाहिए। हालांकि, यह समीक्षा भी हमेशा सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता के अधीन ही रहेगी। किसी भी धर्म की स्वतंत्रता के नाम पर अमानवीय कृत्यों को समाज में कभी स्वीकार नहीं किया जा सकता।

भगवान अय्यप्पा के नित्य ब्रह्मचर्य का दिया गया हवाला

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत खुद को धर्म का विशेषज्ञ बिल्कुल नहीं मानती। लेकिन अगर कोई प्रथा मानव बलि जैसी हो, तो उसकी न्यायिक समीक्षा जरूर होगी। सरकार ने कहा कि सबरीमाला में महिलाओं पर प्रतिबंध लैंगिक भेदभाव का मामला नहीं है। यह प्रतिबंध भगवान अय्यप्पा के नित्य ब्रह्मचारी होने की धार्मिक मान्यता से पूरी तरह जुड़ा है। सरकार के अनुसार, हर धार्मिक मान्यता को सिर्फ शारीरिक स्वायत्तता या व्यक्तिगत गरिमा के नजरिए से देखना बिल्कुल सही नहीं है।

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