Delhi News: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक ऐतिहासिक व्यवस्था देते हुए साफ कर दिया है कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा जजों के चयन की प्रक्रिया न्यायिक समीक्षा के दायरे से पूरी तरह बाहर है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि यह पूरी चयन प्रक्रिया सूचना के अधिकार यानी आरटीआई अधिनियम के तहत भी नहीं आती है।
कॉलेजियम के फैसलों में अदालतें हस्तक्षेप नहीं करेंगी
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच ने हिमाचल प्रदेश के सीनियर ज्यूडिशियल ऑफिसर अरविंद मल्होत्रा की रिट याचिका पर सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया। मल्होत्रा का आरोप था कि हाईकोर्ट कॉलेजियम ने सुप्रीम कोर्ट के उस पुराने आदेश का पालन नहीं किया, जिसमें उनके नाम पर विचार करने को कहा गया था।
इस गंभीर मामले पर बेंच ने दो टूक शब्दों में कहा कि हम कोई पेंडोरा बॉक्स यानी मुसीबतों का पिटारा नहीं खोलना चाहते हैं। सर्वोच्च अदालत कॉलेजियम के फैसलों में किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं करेगी। अदालत ने बताया कि कुछ सूटेबल उम्मीदवारों को चुनने के लिए सैकड़ों अधिकारियों को बातचीत के लिए बुलाया जाता है।
वरिष्ठता के आधार पर प्रमोशन का दावा सही नहीं
सुनवाई के दौरान अरविंद मल्होत्रा के वकील बलबीर सिंह ने दलील दी कि छह सितंबर को दिए गए फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के एकतरफा फैसले को नामंजूर किया था। वकील के मुताबिक चयन प्रक्रिया कॉलेजियम द्वारा सामूहिक रूप से की जानी चाहिए थी, न कि मुख्य न्यायाधीश द्वारा व्यक्तिगत रूप से।
जब मल्होत्रा ने शिकायत की कि उनसे जूनियर अधिकारियों को पदोन्नति के लिए रिकमेंड किया गया है, तो बेंच ने स्थिति स्पष्ट की। बेंच ने कहा कि यह पूरी तरह कॉलेजियम द्वारा आंकी गई सूटेबिलिटी का सवाल है। किसी जूनियर अधिकारी की सिफारिश होने से किसी व्यक्ति को सीधे अदालत आने का अधिकार नहीं मिल जाता।
सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी के बाद बदलाव संभव नहीं
बेंच ने आगे कहा कि महज वरिष्ठता के कारण कोई भी पदोन्नति का कानूनी हकदार नहीं बन जाता है। कॉलेजियम का फैसला उसकी अपनी संतुष्टि पर आधारित होता है और इस पर कोई सवाल नहीं उठा सकता। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जून में तीन ज्यूडिशियल ऑफिसर्स को हाईकोर्ट का जज नियुक्त करने की मंजूरी दी थी।
जस्टिस नागरत्ना की बेंच ने अरविंद मल्होत्रा को सलाह देते हुए कहा कि आप अभी काफी युवा हैं और आपको थोड़ा इंतजार करना चाहिए। अदालत ने याचिका का निपटारा करते हुए साफ किया कि एक बार जब सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम इसे मंजूरी दे देता है, तो हम न्यायिक पक्ष में इसके सही या गलत होने पर कोई दखल नहीं दे सकते।

