Jammu-Kashmir News: भारतीय राजनीति में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम बेहद सम्मान से लिया जाता है। उन्होंने देश की एकता और अखंडता के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। साल 1952 में जम्मू-कश्मीर की एक विशाल जनसभा में उन्होंने संकल्प लिया था कि वह देश को एक ही संविधान दिलाएंगे।
डॉ. मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर को मिलने वाले विशेष दर्जे और अलग परमिट व्यवस्था का हमेशा खुलकर विरोध किया। उनका प्रसिद्ध नारा “एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे” आज भी गूंजता है। इसी संघर्ष के दौरान 23 जून 1953 को कश्मीर में उनकी रहस्यमयी मृत्यु हो गई थी।
कोलकाता में जन्म और 33 साल की उम्र में बने सबसे युवा कुलपति
उनका जन्म 6 जुलाई 1901 को कलकत्ता के एक बेहद प्रतिष्ठित और शिक्षित परिवार में हुआ था। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी बंगाल के जाने-माने शिक्षाविद थे। डॉ. मुखर्जी ने इंग्लैंड से बैरिस्टर की डिग्री हासिल की थी। इसके बाद उन्होंने कानून और शिक्षा के क्षेत्र में नए रिकॉर्ड बनाए थे।
उनका सबसे बड़ा शैक्षणिक योगदान तब सामने आया, जब वह मात्र 33 वर्ष की आयु में कलकत्ता यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर बने। उस समय वह दुनिया के सबसे युवा कुलपतियों में से एक थे। अपने कार्यकाल में उन्होंने एजुकेशन सिस्टम में कई बड़े और आधुनिक बदलाव किए थे।
नेहरू कैबिनेट से दिया इस्तीफा और की भारतीय जनसंघ की स्थापना
आजादी के बाद प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें देश का पहला उद्योग और आपूर्ति मंत्री बनाया था। हालांकि, साल 1950 में हुए नेहरू-लियाकत समझौते के विरोध में उन्होंने कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया। उनका मानना था कि शरणार्थियों के अधिकारों पर सरकार का रुख सही नहीं है।
इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहयोग से 21 अक्टूबर 1951 को भारतीय जनसंघ की स्थापना की। यही संगठन आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के रूप में विकसित हुआ। उन्होंने संसद से लेकर सड़क तक जम्मू-कश्मीर में लागू अनुच्छेद 370 के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन चलाया था।
बिना परमिट कश्मीर में एंट्री और जेल में हुई रहस्यमयी मौत
उस दौर में किसी भी भारतीय नागरिक को जम्मू-कश्मीर में जाने के लिए विशेष परमिट की जरूरत होती थी। डॉ. मुखर्जी ने इसे देश की संप्रभुता के खिलाफ माना। उन्होंने 11 मई 1953 को बिना परमिट कश्मीर में एंट्री की, जिसके बाद उन्हें तुरंत अरेस्ट कर नजरबंद कर दिया गया।
गिरफ्तारी के लगभग डेढ़ महीने बाद 23 जून 1953 को जेल में ही उनकी अचानक मृत्यु हो गई। सरकार ने मौत की वजह बीमारी बताई, लेकिन उनकी माता योगमाया देवी सहित पूरे देश ने इस पर सवाल उठाए थे। भारी जन-आक्रोश के बाद आखिरकार जम्मू-कश्मीर से परमिट सिस्टम को हमेशा के लिए खत्म कर दिया गया था।

