Delhi News: देश की सर्वोच्च अदालत ‘सुप्रीम कोर्ट’ ने अस्थायी कर्मचारियों के हक में एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कहा है कि कोई भी सरकार या विभाग अस्थायी कर्मियों से स्थायी कर्मचारियों की तरह काम लेकर उन्हें पेंशन और अन्य लाभों से वंचित नहीं रख सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समान काम कराने के बाद भी कर्मचारियों को उनके अधिकारों से दूर रखना सरासर नाइंसाफी है। अदालत के मुताबिक, राज्य एक ‘आदर्श नियोक्ता’ होता है। ऐसे में वह अपनी प्रशासनिक ढिलाई या सुस्ती के चलते दशकों तक सेवाएं देने वाले कर्मचारियों को बुढ़ापे में बेसहारा नहीं छोड़ सकता।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ए.जी. मसीह की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए पटना हाईकोर्ट के उस पुराने आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें डाक विभाग में दशकों तक नाइट गार्ड के रूप में सेवाएं देने वाले अस्थायी कर्मचारियों को पेंशन लाभ देने से साफ इन्कार कर दिया गया था।
पेंशन कोई खैरात नहीं, बल्कि एक संवैधानिक अधिकार है
शीर्ष अदालत ने साल 2013 के अपने एक पुराने और ऐतिहासिक फैसले का कड़ा हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि पेंशन कोई खैरात, दया या इनाम नहीं है, बल्कि यह कर्मचारी द्वारा अपने जीवन के महत्वपूर्ण वर्षों में की गई कड़ी मेहनत और सेवा की संचित कमाई होती है, जिस पर उसका पूरा हक है।
अदालत ने जोर देकर कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 300ए (Article 300A) के तहत पेंशन संपत्ति के समान ही एक ‘संवैधानिक अधिकार’ की श्रेणी में आता है। विभाग की किसी भी प्रशासनिक विफलता या लेट-लतीफी के कारण किसी भी नागरिक के इस वैध और मौलिक कानूनी अधिकार को छीना या अमान्य नहीं किया जा सकता।
पीठ ने डाक विभाग की साल 1991 की विशेष योजना का भी जिक्र किया, जिसका मुख्य उद्देश्य ही इन अस्थायी श्रमिकों को नियमित रूप से ग्रुप ‘डी’ कर्मचारियों के समकक्ष लाना था। इन कर्मचारियों को पहले से ही महंगाई भत्ता (DA) और मकान किराया भत्ता (HRA) मिल रहा था, जो उनके काम के स्थायी होने का सबूत है।
तीन महीने के भीतर पूरा भुगतान करने का अंतिम अल्टीमेटम
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के नीति निदेशक तत्व (अनुच्छेद 38, 39 और 43) राज्य को सामाजिक-आर्थिक न्याय सुनिश्चित करने और श्रमिकों को सम्मानजनक जीवन देने की बड़ी जिम्मेदारी सौंपते हैं। कोई भी सरकारी तंत्र इन संवैधानिक आदर्शों और जिम्मेदारियों से अपनी आंखें बिल्कुल नहीं मूंद सकता है।
सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार को बेहद सख्त लहजे में निर्देश दिया है कि वह इन पूर्व कर्मचारियों या उनके कानूनी वारिसों की पेंशन और रिटायरमेंट के अन्य सभी लाभों की तुरंत गणना करे। इसके साथ ही अगले तीन महीने के भीतर सभी बकाये का अनिवार्य रूप से भुगतान सुनिश्चित किया जाए।
अदालत ने आदेश का पालन न होने पर सख्त रुख अपनाते हुए चेतावनी दी है कि यदि तय की गई तीन महीने की समय सीमा के भीतर भुगतान नहीं किया गया, तो संबंधित विभाग को कुल बकाया राशि पर छह प्रतिशत (6%) की वार्षिक दर से अतिरिक्त ब्याज भी देना होगा।
Author: Gaurav Malhotra


