सड़क हादसों में मुआवजे पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, अब केवल एक पक्ष पर नहीं मढ़ा जा सकेगा दोष

New Delhi News: सुप्रीम कोर्ट ने मोटर दुर्घटना दावों के मामलों में एक ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि आमने-सामने की टक्कर के मामलों में आंख मूंदकर केवल एक पक्ष को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि लापरवाही तय करने के लिए इसमें शामिल सभी पक्षों के आचरण का संतुलित और निष्पक्ष मूल्यांकन करना अनिवार्य है। जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और विजय बिश्नोई की पीठ ने माना कि दुर्घटना की जिम्मेदारी तय करते समय तुलनात्मक दृष्टिकोण अपनाना कानूनी रूप से आवश्यक है।

निचली अदालतों के पुराने फैसले को शीर्ष अदालत ने पलटा

यह मामला वर्ष 2009 में हुए एक जानलेवा सड़क हादसे से जुड़ा है, जिसमें मुआवजे के दावों को पहले खारिज कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने अब उस फैसले को रद्द कर दिया है। अदालत ने पाया कि मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (एमएसीटी) और हाई कोर्ट ने हरियाणा रोडवेज के बस चालक की भूमिका की उचित जांच नहीं की थी। उन्होंने सारा दोष मृत कार चालक पर डाल दिया, जिसे शीर्ष अदालत ने एक बड़ी कानूनी गलती माना है।

भिवानी ट्रिब्यूनल को फिर से सुनवाई के कड़े निर्देश

शीर्ष अदालत ने इस पूरे मामले को नए सिरे से विचार करने के लिए एमएसीटी, भिवानी को वापस भेज दिया है। अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि निचली अदालतों द्वारा अपनाया गया दृष्टिकोण स्थापित कानूनी सिद्धांतों के खिलाफ था। कोर्ट ने जोर दिया कि लापरवाही का निर्धारण निष्पक्ष होना चाहिए, खासकर उन परिस्थितियों में जहां दोनों पक्षों की जिम्मेदारी होने की संभावना हो। यह आदेश भविष्य में दुर्घटना के दावों के निपटारे के लिए एक नई नजीर पेश करेगा।

हरियाणा के बालम्भा मोड़ पर हुआ था यह दर्दनाक हादसा

यह विवाद 13 जनवरी 2009 को हरियाणा के बालम्भा मोड़ के पास हुई एक भीषण सड़क दुर्घटना से शुरू हुआ था। इस हादसे में हरि ओम और शेर सिंह नामक दो व्यक्तियों की मौके पर ही मौत हो गई थी। उनकी कार और हरियाणा रोडवेज की बस के बीच जबरदस्त आमने-सामने की टक्कर हुई थी। मुआवजे के लिए हरि ओम की पत्नी प्रमिला और उनके कानूनी वारिसों ने लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी, जिसके बाद मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंचा।

हाई कोर्ट ने भी पहले खारिज कर दी थी याचिका

सुप्रीम कोर्ट पहुंचने से पहले पीड़ितों को निचली अदालतों से निराशा हाथ लगी थी। ट्रिब्यूनल ने शुरुआत में यह कहते हुए दावे को खारिज किया था कि दुर्घटना के लिए पूरी तरह कार चालक हरि ओम ही जिम्मेदार थे। बाद में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने भी इसी फैसले पर मुहर लगा दी थी। हालांकि, अब सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद पीड़ितों को न्याय की नई उम्मीद जगी है और बस चालक की भूमिका की भी जांच होगी।

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