Delhi News: सदियों से समाज को सनातन और आध्यात्मिक राह दिखाने वाले मंदिर के पुजारियों और सेवादारों की दयनीय स्थिति को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत आज एक बड़ा कदम उठाने जा रही है। सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों में कार्यरत इन कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को एक बेहद महत्वपूर्ण सुनवाई होने वाली है।
मशहूर वकील अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर की गई एक जनहित याचिका पर आज सुप्रीम कोर्ट के माननीय जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ विस्तार से सुनवाई करेगी। इस याचिका में केंद्र और सभी राज्य सरकारों को एक विशेष न्यायिक आयोग या विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश देने की मांग पुरजोर तरीके से उठाई गई है।
यह प्रस्तावित समिति देश भर के मंदिर कर्मचारियों के वेतन, भत्तों और अन्य जरूरी लाभों की नए सिरे से समीक्षा करेगी। याचिका में साफ कहा गया है कि जब भी सरकार किसी मंदिर का पूरा प्रशासनिक और आर्थिक नियंत्रण अपने हाथों में लेती है, तो वहां काम करने वाले पुजारियों के साथ सरकार का एक सीधा नियोक्ता-कर्मचारी का कानूनी संबंध बन जाता है।
न्यूनतम वेतन न मिलना सीधे तौर पर मौलिक अधिकारों का हनन
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि इसके बावजूद पुजारियों को आज के जीवन स्तर के अनुकूल सम्मानजनक वेतन बिल्कुल नहीं दिया जा रहा है। यह क्रूर व्यवस्था उनके सम्मान से जीने और आजीविका के मौलिक अधिकार यानी संविधान के अनुच्छेद 21 का सीधा और स्पष्ट उल्लंघन है, जिसे अब और बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है।
इस याचिका में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु जैसे राज्यों की जमीनी घटनाओं का हवाला दिया गया है। राज्य सरकारों के सीधे नियंत्रण में होने के बावजूद इन सेवादारों को अकुशल श्रमिकों के बराबर भी न्यूनतम वेतन नहीं मिल रहा है। इस घोर उपेक्षा के कारण हजारों पुजारियों का परिवार आज भुखमरी की कगार पर पहुंच चुका है।
याचिका में तमिलनाडु के एक मंदिर की फरवरी 2025 की घटना का भी विशेष जिक्र है, जहां पुजारियों द्वारा आरती की थाली में ‘दक्षिणा’ लेने पर भी पूरी तरह रोक लगा दी गई थी। महंगाई के इस दौर में पुजारियों के साथ हो रहा यह आर्थिक शोषण और भेदभाव पूरी तरह अनुचित है, जिसे लेकर अब न्याय की उम्मीद जगी है।
Author: Pandit Balkrishan Sharma

