World News: दुनिया खुद को सुपरपावर मानने वाले अमेरिका के खतरनाक हथियारों से कांपती है। अमेरिका के पास F-35 फाइटर जेट, जानलेवा ड्रोन और समंदर फाड़ने वाली परमाणु पनडुब्बियां हैं। लेकिन सोचिए, अगर कोई देश बिना एक भी मिसाइल दागे अमेरिका की जड़ें हिला दे तो क्या होगा? पिछले 15 सालों से अमेरिका एक ऐसे ही ‘अदृश्य भूत’ से लड़ रहा है। यह भूत कोई और नहीं, बल्कि ईरान की खामोश लेकिन बेहद खतरनाक साइबर फौज है। ईरान ने कंप्यूटर स्क्रीन के पीछे बैठकर अमेरिका के अजेय होने के गुरूर को चकनाचूर कर दिया है।
सीआईए चीफ ने कबूला था ईरान की साइबर ताकत का खौफ
अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए (CIA) के पूर्व डायरेक्टर जॉन ब्रेनन ने भी इस कड़वे सच को माना था। उनका कहना था कि ईरान की साइबर क्षमता बहुत आधुनिक और बेहद खतरनाक है। ईरान बिना कोई बम फोड़े अमेरिका में बड़ी तबाही और तगड़ा व्यवधान पैदा कर सकता है। ब्रेनन की यह चेतावनी बिल्कुल सच साबित हुई है। आज अमेरिका की सेना नहीं, बल्कि उसके बैंक, ऊर्जा कंपनियां और अहम इंफ्रास्ट्रक्चर ईरान के सीधे निशाने पर हैं।
ऑपरेशन अबाबिल: जब हैकर्स ने रोकी थी अमेरिकी बैंकों की सांस
अमेरिका को ईरान की साइबर ताकत का पहला बड़ा झटका 2011 से 2013 के बीच लगा। ईरान ने ‘ऑपरेशन अबाबिल’ नाम से एक खौफनाक साइबर हमला किया। ईरानी हैकर्स ने बैंक ऑफ अमेरिका, जेपी मॉर्गन चेस और कैपिटल वन जैसे बड़े वित्तीय मगरमच्छों की वेबसाइट्स पर फर्जी ट्रैफिक की बाढ़ ला दी। इसे डीडीओएस (DDoS) अटैक कहते हैं। इससे इन बैंकों की ऑनलाइन सेवाएं पूरी तरह ठप हो गईं। यह इस बात का सबूत था कि अमेरिकी सिस्टम पूरी तरह सुरक्षित नहीं है।
2013 में न्यूयॉर्क के डैम तक पहुंच गए थे ईरानी हैकर्स
साल 2013 में ईरान ने एक और खतरनाक कदम उठाया। ईरानी हैकर्स न्यूयॉर्क के बोमन एवेन्यू डैम के इंडस्ट्रियल कंट्रोल सिस्टम में घुस गए। हालांकि यह एक छोटा डैम था, लेकिन इसका संदेश बहुत डरावना था। अगर हैकर्स किसी डैम के कंट्रोल रूम तक पहुंच सकते हैं, तो कल वे किसी न्यूक्लियर पावर प्लांट या पूरे बिजली ग्रिड को भी आसानी से हैक कर सकते हैं। अमेरिका समझ गया था कि दुश्मन अब उनके घर के भीतर तक आ चुका है।
ऑपरेशन क्लीवर और सुलेमानी की मौत का खौफनाक पलटवार
ईरान ने 2012 से 2014 के बीच ‘ऑपरेशन क्लीवर’ शुरू किया। इस बार निशाने पर अमेरिका की एयरलाइंस, एनर्जी कंपनियां और ट्रांसपोर्ट सिस्टम थे। यह सिर्फ हमले नहीं थे, बल्कि ईरान अमेरिकी सिस्टम की सारी कमजोरियां तलाश रहा था। 2020 में जब अमेरिका ने ईरानी कमांडर कासिम सुलेमानी को मारा, तो ईरान ने साइबर स्पेस में भी करारा जवाब दिया। ईरानी हैकर्स ने अमेरिकी सरकार की वेबसाइट्स को हैक करके वहां सीधे राजनीतिक चेतावनियां लिख दीं।
हथियारों की रेस नहीं, अब डिजिटल कुरुक्षेत्र में हार रहा अमेरिका
ईरान कोई ग्लोबल साइबर सुपरपावर नहीं है। उसके पास चीन या रूस जितनी बड़ी हैकिंग फौज भी नहीं है। लेकिन अमेरिका इस बात से डरा है कि ईरान के पास जो थोड़ी क्षमता है, वह उसे सीधा नुकसान पहुंचाने के लिए इस्तेमाल करता है। ईरान ने पिछले 15 सालों में अपनी साइबर क्षमता बढ़ाने और खतरनाक मैलवेयर बनाने में भारी निवेश किया है। अरबों डॉलर के हथियारों से लैस अमेरिका आज एक सर्वर रूम में बैठे ईरानी हैकर से खौफ खा रहा है।


