Berlin News: अमेरिका के रक्षा विभाग ने जर्मनी से अपने पांच हजार सैनिकों को वापस बुलाने का बहुत बड़ा ऐलान किया है। अगले छह से बारह महीनों में यह वापसी पूरी हो जाएगी। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह फैसला केवल सैन्य कटौती नहीं है। इसके पीछे ईरान के साथ चल रहा मौजूदा तनाव मुख्य वजह है। जर्मन नेतृत्व के साथ अमेरिका का सीधा टकराव भी हुआ है। इस बड़े कदम ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है।
ईरान के मुद्दे पर भड़की जुबानी जंग
इस पूरे विवाद के केंद्र में अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनातनी है। अमेरिका चाहता है कि नाटो देश इस युद्ध में उसका खुलकर साथ दें। लेकिन जर्मनी ऐसा करने से लगातार बच रहा है। जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने हाल ही में एक बड़ा सार्वजनिक बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि ईरान को लेकर अमेरिका के पास कोई स्पष्ट रणनीति नहीं है। चांसलर के इसी कड़े बयान ने आग में घी डालने का काम किया।
डोनाल्ड ट्रंप ने किया तीखा पलटवार
जर्मन चांसलर की इस टिप्पणी ने व्हाइट हाउस में बैठे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बुरी तरह भड़का दिया। ट्रंप ने फ्रेडरिक मर्ज पर तुरंत तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि जर्मन नेता बिल्कुल नहीं जानते कि वे क्या बातें कर रहे हैं। ट्रंप ने उन्हें यूक्रेन युद्ध को खत्म करने में भी पूरी तरह नाकाम बताया। इस भयंकर जुबानी जंग और तनातनी के तुरंत बाद ही अमेरिका ने कड़ा कदम उठाया। जर्मनी से सैनिकों की वापसी शुरू हुई।
जर्मनी से क्या-क्या वापस लेगा अमेरिका
पेंटागन के प्रवक्ता शॉन पार्नेल ने इस सैन्य वापसी की पूरी जानकारी दी है। इसके तहत जर्मनी में पहले से तैनात एक प्रमुख आर्मी ब्रिगेड कॉम्बैट टीम को वापस बुलाया जा रहा है। इसके अलावा ट्रंप प्रशासन ने एक और बड़ा फैसला लिया है। जो बाइडन प्रशासन ने जर्मनी में लॉन्ग-रेंज फायर्स बटालियन तैनात करने की योजना बनाई थी। इसमें कई खतरनाक टॉमहॉक मिसाइलें भी शामिल थीं। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने अब इस योजना को रद्द किया है।
पुतिन के लिए बताया जा रहा बड़ा तोहफा
ट्रंप के इस फैसले से खुद अमेरिका के भीतर भी भारी बवाल मचा हुआ है। उनकी अपनी रिपब्लिकन पार्टी के कई वरिष्ठ नेता इस फैसले से काफी नाराज हैं। सीनेट और हाउस आर्म्ड सर्विसेज कमेटी के रिपब्लिकन अध्यक्षों ने इसका कड़ा विरोध किया है। उनका साफ तौर पर मानना है कि तनाव के समय यह कदम बिल्कुल गलत है। यूरोप से सेना हटाना रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के लिए एक बहुत बड़ा और कीमती तोहफा साबित होगा।
आठ दशक पुराना है अमेरिकी सेना का इतिहास
जर्मनी में अमेरिकी सैनिकों की भारी मौजूदगी कोई नई बात बिल्कुल नहीं है। इसके तार आठ दशक पुराने दूसरे विश्व युद्ध के इतिहास से जुड़े हुए हैं। साल उन्नीस सौ पैंतालीस में नाजी जर्मनी की हार के बाद मित्र देशों ने वहां कब्जा किया था। उस समय अमेरिका ने शांति व्यवस्था कायम रखने के लिए अपनी फौज वहां रखी थी। इसके बाद शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ से बचने के लिए वहां अमेरिकी सैन्य बल तैनात रहा।


