क्रिप्टो डील के बहाने अमेरिका में बढ़ी पाकिस्तान की पहुंच, डोनाल्ड ट्रंप के किचन कैबिनेट तक बनाई खास जगह

Islamabad News: पाकिस्तान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीब आने के लिए एक नया पैंतरा आजमाया है। उसने ट्रंप के पारिवारिक बिजनेस वर्ल्ड लिबर्टी फाइनेंशियल के साथ बड़ा क्रिप्टो समझौता किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस डील का असली मकसद आर्थिक लाभ से ज्यादा ट्रंप प्रशासन तक सीधी कूटनीतिक पहुंच बनाना था।

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ट्रंप के पारिवारिक बिजनेस से जुड़ा पाकिस्तान का बड़ा कूटनीतिक दांव

अल जजीरा की एक रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान और डोनाल्ड ट्रंप की क्रिप्टो कंपनी के बीच यह समझौता फिलहाल कागजों पर ही सिमटा हुआ है। इसके बावजूद इस्लामाबाद वाशिंगटन के सत्ता गलियारों में अपनी पैठ मजबूत करने में पूरी तरह सफल रहा है। इससे दोनों देशों के बीच राजनैतिक दूरियां काफी कम हुई हैं।

अमेरिकी ऑफिस ऑफ गवर्नमेंट एथिक्स की सालाना रिपोर्ट के अनुसार ट्रंप परिवार को इस क्रिप्टो व्यापार से भारी मुनाफा हुआ है। वर्ष 2025 में उनके इस डिजिटल करेंसी बिजनेस ने करीब 1.4 अरब डॉलर की बंपर कमाई की है। पाकिस्तान इसी मुनाफे वाले बिजनेस के जरिए ट्रंप के करीब आना चाहता था।

सीमा पार भुगतान के लिए हुआ था खास एमओयू समझौता

पाकिस्तान के वित्त मंत्रालय ने इस साल जनवरी में ट्रंप की सहयोगी कंपनी एससी फाइनेंशियल टेक्नोलॉजीज के साथ एक एमओयू साइन किया था। इसके तहत सीमा पार भुगतान के लिए डॉलर आधारित स्टेबलकॉइन का इस्तेमाल होना था। इस खास मौके पर प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर खुद मौजूद थे।

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इस हाई प्रोफाइल समझौते के छह महीने बीतने के बाद भी जमीन पर कोई काम शुरू नहीं हो सका है। वर्तमान में न तो किसी पायलट प्रोजेक्ट की शुरुआत हुई है और न ही किसी वित्तीय लेनदेन की पुष्टि हुई है। इसके बावजूद पाकिस्तान इस डील को अपनी बड़ी राजनीतिक जीत मान रहा है।

आर्थिक लाभ से ज्यादा कूटनीतिक संबंधों को सुधारने पर रहा जोर

इस बिजनेस डील के बाद दोनों देशों के कूटनीतिक रिश्तों में अभूतपूर्व तेजी देखी गई है। पाकिस्तान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित कर दिया। इसके तुरंत बाद जून 2025 में ट्रंप ने पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर को व्हाइट हाउस में लंच पर बुलाया था।

कराची के वरिष्ठ अर्थशास्त्री खुर्रम हुसैन के अनुसार यह पूरा प्रयास पे फॉर एक्सेस की रणनीति का हिस्सा था। पाकिस्तान का मुख्य लक्ष्य क्रिप्टो प्रोजेक्ट चलाना नहीं बल्कि अमेरिकी सरकार में लॉबिंग करना था। ईरान और इजरायल विवाद के दौरान भी पाकिस्तान ने दोनों देशों के बीच मध्यस्थता की कोशिश की थी।

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