टाइगर का खौफ: पीलीभीत के जंगलों से बाहर भागे तेंदुए, अब 1700 हेक्टेयर में बनेगी प्रदेश की पहली लेपर्ड सफारी

Uttar Pradesh News: पीलीभीत टाइगर रिजर्व (PTR) में बाघों का कुनबा तेजी से बढ़ने के बाद जंगलों में एक अनोखा संकट खड़ा हो गया है। भारी-भरकम बाघों के बढ़ते खौफ और आपसी वर्चस्व की लड़ाई के डर से तेंदुए अब टाइगर रिजर्व के मुख्य जंगलों को छोड़कर बाहर की ओर भाग रहे हैं।

जंगल के बाहर आसान शिकार मिलने के कारण तेंदुओं ने ग्रामीण इलाकों के पास अपना नया ठिकाना बनाना शुरू कर दिया है। वन्यजीवों के इस विस्थापन से तराई के इलाकों में मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict) तेजी से बढ़ने की गंभीर आशंका पैदा हो गई है, जिसने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है।

25 से बढ़कर 80 के पार पहुंची बाघों की संख्या

पीटीआर में हरी घास, शुद्ध पेयजल की उत्तम व्यवस्था और साल के घने जंगलों के साथ ऊंची-ऊंची झाड़ियां वन्यजीवों के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं हैं। यही वजह है कि इसे टाइगर रिजर्व घोषित किए जाने के बाद से यहां बाघों की संख्या महज 25 से बढ़कर अब 80 के करीब पहुंच चुकी है।

जंगलों के भीतर बाघों का दबदबा होने के कारण वर्तमान में केवल 25 से 30 तेंदुए ही अंदर सुरक्षित बचे हैं। इसके विपरीत, करीब 35 से 40 तेंदुए जंगल की सीमा से बाहर गन्ने के खेतों और सामाजिक वानिकी के क्षेत्रों में डेरा जमाए हुए हैं, जिससे किसानों में भारी दहशत है।

पांच महीनों में 9 तेंदुए आए बाहर, तीन की हुई मौत

पिछले पांच महीनों के आंकड़ों पर गौर करें तो पीटीआर से बाहर निकले 9 तेंदुओं को भारी संघर्ष का सामना करना पड़ा है। इस दौरान अलग-अलग हादसों में तीन तेंदुओं की दर्दनाक मौत भी हो चुकी है, जबकि कई को वन विभाग की टीमों ने रेस्क्यू कर दोबारा जंगलों में सुरक्षित छोड़ा है।

हाल ही में गजरौला के ग्राम दियूरा में बाहर निकले दो तेंदुओं ने खेतों में काम कर रहे किसानों पर जानलेवा हमला कर दिया था। इस खूनी संघर्ष में पांच किसान गंभीर रूप से घायल हो गए थे, जिसके बाद ग्रामीणों ने लाठी-डंडों की मदद से एक तेंदुए को मौके पर ही दबोच लिया था।

गोपालपुर के जंगलों में आकार लेगी भव्य लेपर्ड सफारी

तेंदुओं को सुरक्षित पर्यावास देने और इंसानों से उनके टकराव को पूरी तरह रोकने के लिए सरकार ने पीलीभीत में भव्य ‘लेपर्ड सफारी’ विकसित करने की आधिकारिक घोषणा की है। इसके तहत पीलीभीत और शाहजहांपुर के सामाजिक वानिकी क्षेत्र के करीब 1700 हेक्टेयर जंगल को आरक्षित किया गया है।

मुख्य वन संरक्षक की ओर से भेजे गए इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को उत्तर प्रदेश शासन से हरी झंडी मिल चुकी है। अब केवल कार्यदायी संस्था के चयन का इंतजार है। इस सफारी पार्क में रिहाइशी इलाकों से रेस्क्यू किए गए और आपसी संघर्ष में घायल हुए तेंदुओं के पुनर्वास की व्यवस्था होगी।

ईको-टूरिज्म और स्थानीय रोजगार को मिलेगा भारी बढ़ावा

इस लेपर्ड सफारी पार्क के धरातल पर उतरने से तराई क्षेत्र में मानव-वन्यजीव संघर्ष में भारी कमी आएगी। इसके साथ ही, बिजनौर और मुरादाबाद के कांठ व ठाकुरद्वारा जैसे क्षेत्रों से भटक कर आने वाले वन्यजीवों को भी यहां एक बड़ा और पूरी तरह सुरक्षित आशियाना मिल सकेगा।

वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, इस सफारी पार्क के निर्माण से उत्तर प्रदेश में ईको-टूरिज्म (Eco-Tourism) को एक नई ऊंचाई मिलेगी। इससे स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए साधन खुलेंगे और वन्यजीवों के प्रति ग्रामीणों का लगाव व संवेदनशीलता भी पहले से कहीं अधिक बढ़ेगी।

Author: Ajay Mishra

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