Himachal News: हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने अस्थायी कर्मचारियों को नियमित करने के मामले में कड़ा रुख अपनाया है। सालों तक सेवाएं लेने के बाद भी कर्मचारियों को पक्का न करने पर कोर्ट ने गहरी नाराजगी जताई है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया की खंडपीठ ने सरकार की अपील को तुरंत खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लंबे समय तक काम करने वालों को पक्का करना सरकार का कर्तव्य है।
18 साल की लंबी सेवा का मामला
यह पूरा मामला वन विभाग से जुड़ी परियोजनाओं में काम करने वाली याचिकाकर्ता जोती ठाकुर का है। वह साल 2008 से नाममात्र के अंतराल के साथ लगातार अपनी सेवाएं दे रही हैं। लगभग 18 सालों से वह अलग-अलग परियोजनाओं में बेहतरीन काम कर रही हैं। इसके बावजूद सरकार ने उन्हें नियमित कर्मचारी मानने से साफ इनकार कर दिया था। सरकार की दलील थी कि जोती ठाकुर कभी भी हिमाचल प्रदेश सरकार की नियमित कर्मचारी नहीं रही हैं।
सरकार की दलील और कोर्ट का फैसला
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अपनी तरफ से कई दलीलें दीं। सरकार ने कहा कि याचिकाकर्ता ने करीब 10 साल की देरी से अदालत का रुख किया है। उन्हें साल 2014 में ही यह कदम उठाना चाहिए था। लेकिन इससे पहले एकल पीठ ने जोती ठाकुर के पक्ष में एक बड़ा फैसला सुनाया था। न्यायाधीश सत्येन वैद्य की पीठ ने छह साल की अनुबंध सेवा पूरी होने पर उनकी सेवा नियमित करने के साफ निर्देश दिए थे।
अलग-अलग परियोजनाओं में दी सेवाएं
जोती ठाकुर के करियर ग्राफ पर नजर डालें तो उन्होंने कई अहम पदों पर काम किया है।
- 25 जुलाई 2008 को स्वां नदी परियोजना में समूह आयोजक नियुक्त हुईं।
- उन्होंने 30 जून 2016 तक वहां पूरी लगन से काम किया।
- 1 नवंबर 2016 से वन पारिस्थितिकी तंत्र परियोजना में अपनी अहम सेवाएं दीं।
- वर्तमान में 9 मार्च 2018 से आईडीपी में सामाजिक विस्तार अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं।
कर्मचारियों को मिलेगा पूरा वित्तीय लाभ
एकल पीठ ने अपने आदेश में वित्तीय लाभों को लेकर भी एक अहम बात कही थी। अदालत ने स्पष्ट किया था कि वित्तीय लाभ याचिका दायर करने की तिथि से तीन साल पहले तक ही सीमित रहेंगे। अब खंडपीठ ने भी एकल पीठ के इस आदेश को बिल्कुल सही माना है। अदालत ने सरकार को नसीहत दी है कि वह अपनी जिम्मेदारियों से भाग नहीं सकती। लंबे समय तक निरंतर सेवा देने वाले सभी कर्मचारियों को उनका हक मिलना चाहिए।


