आरएसएस के अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख रामलाल का बड़ा दावा: ‘आपातकाल के खिलाफ सत्याग्रह नहीं होता तो नहीं होते 1977 के चुनाव’

Konkan News: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख रामलाल ने शनिवार को आपातकाल के दौर को याद करते हुए एक बड़ा दावा किया है। कोंकण डिवीजन की बैठक के समापन समारोह में उन्होंने कहा कि यदि आरएसएस कार्यकर्ताओं ने आपातकाल के खिलाफ सत्याग्रह में बड़ी संख्या में भाग नहीं लिया होता, तो 1977 में चुनाव नहीं होते।

रामलाल ने अपने संबोधन में बताया कि आपातकाल के दौरान जेल भेजे गए लोगों में लगभग 80 प्रतिशत आरएसएस के स्वयंसेवक थे। उन्होंने खुद भी उस कठिन समय में आठ महीने जेल में बिताए थे। उनका कहना था कि यह संघर्ष लोकतंत्र की बहाली के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुआ, जिसे आज के दौर में याद रखना आवश्यक है।

युद्ध और संकट काल में आरएसएस का योगदान

संगठन के इतिहास को रेखांकित करते हुए रामलाल ने भारत द्वारा लड़े गए विभिन्न युद्धों में स्वयंसेवकों की सक्रिय भूमिका का उल्लेख किया। उन्होंने एक विशेष घटना का जिक्र किया, जहां सैन्य सामग्री दुश्मन के क्षेत्र में गिर गई थी। तब आरएसएस के स्वयंसेवकों ने अपनी जान जोखिम में डालकर रेंगते हुए वह सामग्री सुरक्षित वापस पहुंचाई थी।

उन्होंने बताया कि इस साहसी कार्रवाई में चार स्वयंसेवकों ने अपने प्राणों की आहुति दी, लेकिन उनके नाम कभी सार्वजनिक नहीं किए गए। इसके अतिरिक्त, 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान दिल्ली में यातायात व्यवस्था संभालने जैसे नागरिक कार्यों में भी आरएसएस कार्यकर्ताओं ने प्रशासन को महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया था, जो उनकी अनुशासनबद्ध कार्यप्रणाली को दर्शाता है।

वैचारिक दृष्टिकोण और हिंदुत्व पर टिप्पणी

आरएसएस की कार्यशैली पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि दैनिक शाखाओं के माध्यम से कार्यकर्ताओं में समन्वय, अनुशासन और सामूहिक कार्यप्रणाली का संस्कार डाला जाता है। उनके अनुसार, हिंदुत्व विचारधारा हमेशा ‘सर्वजन हिताय’ यानी सभी के कल्याण के बारे में सोचती है, जो कि संघ का मूल आधार है।

रामलाल ने वर्तमान राजनीतिक और वैचारिक विमर्श पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आज विडंबना यह है कि जो भारत के हितों के विरुद्ध बात करते हैं, उन्हें ‘उदार और प्रगतिशील’ माना जाता है। वहीं, जो लोग हिंदुत्व की बात करते हैं, उन्हें अनावश्यक रूप से ‘सांप्रदायिक या संकीर्ण सोच’ वाला करार दिया जाता है, जो पूरी तरह अनुचित है।

Author: Vikram Naik

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