Himachal News: साल 1920 का मार्च महीना था। सुकेत रियासत (अब सुंदरनगर) अपने नए राजा लक्ष्मण सेन के राज्याभिषेक के जश्न में डूबी थी। लेकिन इस समारोह में महफिल राजा ने नहीं, बल्कि एक ‘मंडी कार’ ने लूटी थी। उस दौर में जब पहाड़ों पर घोड़े और पालकियों का राज था, तब एक लोहे की सवारी का दिखना किसी करिश्मे से कम नहीं था। ब्रिटिश पंजाब के गवर्नर सर ई. डी. मैकलगन इसी कार में सवार होकर विदा हुए थे। सुकेत के राजा खुद उन्हें छोड़ने कार तक आए थे। यह वाकया आज भी इतिहास के पन्नों में एक अनोखी मिसाल के तौर पर दर्ज है।
विंथ्रोप की डायरी में कैद ‘मंडी कार’ का रहस्य
इस शाही कार का दिलचस्प जिक्र ब्रिटिश अफसर विंथ्रोप की डायरी में मिलता है। विंथ्रोप उन दिनों शिमला और आसपास की रियासतों का दौरा कर रहे थे। उनकी डायरी बताती है कि कैसे एक मशीन ने क्षेत्रीय पहचान हासिल कर ली थी। माना जाता है कि मंडी के राजा ने अंग्रेजों से प्रभावित होकर ये कारें खरीदी थीं। मंडी क्षेत्र में पहली बार देखे जाने के कारण लोग इन्हें ‘मंडी कार’ कहने लगे। सुकेत के राज्याभिषेक में शामिल होने के लिए यह कार शायद मंडी रियासत से ही विशेष तौर पर मंगवाई गई थी।
आधुनिकता और ब्रिटिश सत्ता का बड़ा प्रतीक
उस दौर में कारों का होना महज सुविधा नहीं, बल्कि सत्ता और आधुनिकता का प्रदर्शन था। सुकेत रियासत तब ‘शिमला हिल स्टेट्स’ का हिस्सा थी। गवर्नर मैकलगन का इस समारोह में आना बताता है कि ब्रिटिश हुकूमत सुकेत को कितनी अहमियत देती थी। मैकलगन 1919 से 1924 तक पंजाब के गवर्नर रहे। उनकी उपस्थिति और उस ‘मंडी कार’ के सफर ने सुकेत के राज्याभिषेक को तकनीकी बदलाव और राजनीतिक रसूख का एक अनूठा संगम बना दिया था।
पहाड़ी रियासतों में तकनीक का पहला कदम
इतिहासकारों के लिए विंथ्रोप जैसी डायरियां आज जानकारी का सबसे बड़ा स्रोत हैं। ये डायरियां उन बारीकियों को उजागर करती हैं जो सरकारी दस्तावेजों में छूट जाती हैं। ‘मंडी कार’ का जिक्र साबित करता है कि हिमाचल की वादियों में तकनीक ने बहुत पहले ही दस्तक दे दी थी। यह कार न केवल परिवहन का साधन थी, बल्कि यह बदलते दौर की गवाह भी बनी। आज भी जब सुकेत और मंडी के साझा इतिहास की बात होती है, तो इस शाही कार का किस्सा लोगों को रोमांचित कर देता है।


