New Delhi News: देश में लापता और बचाए गए मासूम बच्चों की पहचान अब जल्द ही आसान हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट में एक बेहद अहम याचिका पर सुनवाई हुई है। इस याचिका में बच्चों की पहचान के लिए राष्ट्रीय स्तर पर डीएनए और बायोमेट्रिक प्रणाली बनाने की मांग की गई है। अदालत ने इस मुद्दे को बहुत संवेदनशील माना है। शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता से इस जटिल समस्या का एक ठोस समाधान पेश करने को कहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने मांगा समाधान
जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले की गंभीरता को बारीकी से समझा। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह एक बेहद संवेदनशील विषय है। पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा कि वे अपने सहयोगियों के साथ मिलकर एक विस्तृत रूपरेखा तैयार करें। कोर्ट यह जानना चाहता है कि विभिन्न संस्थानों को एक साझा मंच पर कैसे लाया जाए। इस सहयोगात्मक तंत्र से बच्चों की सटीक पहचान सुनिश्चित करने में काफी मदद मिलेगी।
चार सप्ताह बाद होगी अहम सुनवाई
सर्वोच्च अदालत ने इस अति महत्वपूर्ण मामले की अगली सुनवाई के लिए चार सप्ताह का समय तय किया है। याचिका में केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को स्पष्ट निर्देश देने की अपील की गई है। इसके तहत बचाए गए अज्ञात बच्चों और उनके वास्तविक जैविक माता-पिता का डीएनए नमूना लेना अनिवार्य करने की मांग है। इससे एक वैज्ञानिक डेटाबेस तैयार होगा। यह वैज्ञानिक मिलान प्रणाली खोए हुए बच्चों को उनके असली परिवारों से मिलाने में मदद करेगी।
बायोमेट्रिक पहचान से जगेगी उम्मीद
देश भर में हर साल हजारों बच्चे लापता हो जाते हैं। ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर डीएनए और बायोमेट्रिक डेटाबेस का निर्माण एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। यह प्रणाली बच्चों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा के लिए उचित वैधानिक उपाय सुनिश्चित करेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि वैज्ञानिक पहचान प्रणाली से मानव तस्करी जैसे गंभीर अपराधों पर भी लगाम लगेगी। अब सभी की निगाहें चार हफ्ते बाद होने वाली अगली सुनवाई पर हैं।


