बिजली विभाग की मनमानी पर बड़ा एक्शन: स्मार्ट प्रीपेड मीटर की अनिवार्यता के खिलाफ अवमानना याचिका दायर

Lucknow News: उत्तर प्रदेश में नए बिजली कनेक्शनों पर स्मार्ट प्रीपेड मीटर की अनिवार्यता को लेकर विवाद गहरा गया है। सोमवार को विद्युत नियामक आयोग में पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन के खिलाफ एक अवमानना याचिका दायर की गई। याचिका में आरोप लगाया गया है कि प्रदेश का बिजली विभाग केंद्र सरकार के नियमों और ‘विद्युत अधिनियम-2003’ का खुला उल्लंघन कर रहा है। उपभोक्ता परिषद ने मांग की है कि इस अवैध प्रक्रिया के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को चिह्नित कर उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए।

राष्ट्रीय कानून के उल्लंघन का गंभीर आरोप

राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने नियामक आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों से मुलाकात कर यह याचिका सौंपी। उन्होंने आयोग को बताया कि पावर कॉरपोरेशन पुरानी और निष्प्रभावी अधिसूचनाओं का सहारा लेकर उपभोक्ताओं पर जबरन प्रीपेड मीटर थोप रहा है। जबकि हकीकत यह है कि केंद्र सरकार ने 1 अप्रैल से पूरे देश में प्रीपेड मीटर की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया है। इसे राष्ट्रीय कानून का सीधा उल्लंघन बताया जा रहा है।

बिना सहमति 75 लाख उपभोक्ताओं के मीटर बदले

याचिका में एक और चौंकाने वाला खुलासा किया गया है कि पावर कॉरपोरेशन ने उपभोक्ताओं की अनुमति लिए बिना ही लगभग 75 लाख कनेक्शनों को प्रीपेड मोड में बदल दिया है। यह कदम विद्युत अधिनियम-2003 की धारा 47 (5) की मूल भावना के बिल्कुल विपरीत है। उपभोक्ता परिषद का कहना है कि किसी भी उपभोक्ता की मर्जी के बिना उसके कनेक्शन का स्वरूप बदलना गैर-कानूनी है और यह उपभोक्ताओं के अधिकारों का हनन है।

पोस्टपेड मोड में वापस करने की उठी मांग

अवधेश कुमार वर्मा ने मांग की है कि बिजली वितरण कंपनियों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू की जाए। उन्होंने जोर दिया कि नए कनेक्शन केवल उपभोक्ता की लिखित सहमति पर ही स्मार्ट प्रीपेड मोड में दिए जाने चाहिए। साथ ही, जिन कनेक्शनों को बिना बताए प्रीपेड किया गया है, उन्हें तत्काल प्रभाव से वापस पोस्टपेड मोड में बदला जाए। परिषद ने इस पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच कराने की अपील की है ताकि पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके।

पावर कॉरपोरेशन के ‘उपभोक्ता विरोधी’ रवैये पर नाराजगी

उपभोक्ताओं में इस बात को लेकर भारी नाराजगी है कि विभाग जबरन नई व्यवस्थाएं लागू कर रहा है। जानकारों का मानना है कि प्रीपेड मीटर की अनिवार्यता खत्म होने के बावजूद इसे जारी रखना बिजली कंपनियों की मनमानी को दर्शाता है। अब सबकी निगाहें विद्युत नियामक आयोग के फैसले पर टिकी हैं। यदि आयोग इस याचिका को स्वीकार कर कार्यवाही करता है, तो पावर कॉरपोरेशन के कई बड़े अधिकारियों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं और लाखों उपभोक्ताओं को बड़ी राहत मिल सकती है।

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