दिल्लीवालों तैयार हो जाइए! तपती गर्मी में आसमान से होने वाली है ‘नकली बारिश’, जानिए क्या है फुल प्रूफ प्लान

Delhi News: राजधानी दिल्ली में इस बार भीषण गर्मी और प्रदूषण से निपटने के लिए एक बड़ा कदम उठाया जा रहा है। दिल्ली सरकार और आईआईटी कानपुर मिलकर आसमान से ‘आर्टिफिशियल बारिश’ यानी क्लाउड-सीडिंग कराने की तैयारी कर रहे हैं। पिछले साल अक्टूबर 2025 में इसका ट्रायल सफल नहीं हो पाया था। अब पुरानी गलतियों से सीख कर एक नई और सटीक रणनीति बनाई गई है। सरकार को पूरी उम्मीद है कि इस उन्नत तकनीक से दिल्ली वालों को तपते तापमान और जहरीली हवा से बड़ी राहत मिलेगी।

पिछली बार क्यों फेल हुआ था कृत्रिम बारिश का ट्रायल?

दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग और आईआईटी कानपुर के बीच 25 सितंबर 2025 को एक अहम समझौता हुआ था। इसी के तहत क्लाउड-सीडिंग का ट्रायल किया गया था। आईआईटी कानपुर की रिपोर्ट के अनुसार, उस वक्त बादलों में नमी का स्तर बहुत कम था। इस वजह से बारिश नहीं हो पाई। अब संस्थान ने कहा है कि पिछले ट्रायल्स से उनकी तैयारी काफी मजबूत हो गई है। वैज्ञानिकों ने यह समझ लिया है कि क्लाउड-सीडिंग के लिए ठीक कैसा मौसम और परिस्थितियां चाहिए।

डीजीसीए से मांगी गई नए ट्रायल की अनुमति

सही समय और बादलों में पर्याप्त नमी होने पर ही बारिश की तकनीक सफल होती है। एक अधिकारी ने बताया कि आईआईटी कानपुर ने नए ट्रायल के लिए नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) से अनुमति मांगी है। फिलहाल पिछली रिपोर्ट के परिणामों की बारीकी से समीक्षा हो रही है। यह समीक्षा रिपोर्ट जल्द ही दिल्ली सरकार के साथ साझा की जाएगी। इसी रिपोर्ट के आधार पर इस गर्मी में होने वाले ट्रायल की पक्की तारीख और शेड्यूल तय किया जाएगा।

आर्थिक सर्वेक्षण में भी दिखा दिल्ली सरकार का विजन

सरकार इस अहम योजना को लेकर पूरी तरह से गंभीर है। 23 मार्च को जारी हुए दिल्ली के आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में भी इसका स्पष्ट जिक्र किया गया है। सर्वेक्षण में बताया गया है कि मौसम विभाग (IMD) की सलाह से इस तकनीक के और भी ट्रायल होंगे। इस कृत्रिम बारिश का मुख्य लक्ष्य हवा में मौजूद प्रदूषण के खतरनाक कणों को साफ करना है। इसे केवल गर्मी से राहत नहीं, बल्कि वायु प्रदूषण को रोकने के एक बड़े उपाय के तौर पर देखा जा रहा है।

आखिर क्या होती है यह क्लाउड-सीडिंग तकनीक?

क्लाउड-सीडिंग असल में मौसम के अंदर कृत्रिम बदलाव करने की एक वैज्ञानिक तकनीक है। इसके जरिए बादलों से बारिश होने की संभावना को काफी बढ़ाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में बादलों के बीच सिल्वर आयोडाइड और कुछ खास रसायन फैलाए जाते हैं। ये रसायन बादलों की नमी को अपनी तरफ खींचकर छोटी-छोटी पानी की बूंदें बना देते हैं। पिछले ट्रायल में भी बादलों के भीतर सिल्वर आयोडाइड और सोडियम क्लोराइड वाले आठ केमिकल फ्लेयर छोड़े गए थे।

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