Prayagraj News: प्रयागराज में गंगा और यमुना का जलस्तर बढ़ते ही तटीय इलाकों के लोगों की मुश्किलें बढ़ जाती हैं। पानी की निकासी की उचित व्यवस्था न होने से कछार क्षेत्रों में भारी जलभराव हो जाता है। इससे न केवल बच्चों की पढ़ाई और आम जनजीवन प्रभावित होता है, बल्कि जहरीले जीवों के कारण घरों में रहना भी असुरक्षित हो जाता है।
दारागंज स्थित नागवासुकी मंदिर के पास रहने वाले राजेंद्र पाल का कहना है कि बाढ़ के समय पूरा परिवार छत पर रहने को मजबूर होता है। रात में कब पानी घर के भीतर आ जाए, इसका पता ही नहीं चलता। किसी सदस्य के बीमार होने पर उन्हें अस्पताल ले जाना सबसे बड़ी चुनौती साबित होता है, जिससे पूरे परिवार में डर का माहौल रहता है।
आर्थिक संकट और रोजगार की मार
स्थानीय निवासी साहिल पाल ने बताया कि बाढ़ के दौरान स्कूल और रास्ते डूबने से बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह रुक जाती है। उनका लोहे का काम भी बंद हो जाता है, जिससे घर का खर्च चलाना मुश्किल हो जाता है। पानी की निकासी का सही प्रबंध न होना इस पूरे संकट की जड़ है, जो हर साल परिवारों को बदहाली की ओर धकेल देता है।
भोला का कहना है कि पानी उतरने के बाद कीचड़ और गंदगी से बीमारियाँ फैलती हैं। सांप और गोह जैसे जहरीले जीव घरों में घुस आते हैं, जिससे जान का खतरा बना रहता है। राहत सामग्री अक्सर देर से पहुँचती है। कुलदीप निषाद ने बताया कि मजदूरी बंद होने से कई दिनों तक चूल्हा जलाना तक नामुमकिन हो जाता है, जिससे गरीब परिवार परेशान रहते हैं।
महिलाओं और बच्चों की बढ़ती मुश्किलें
सीमा ने बताया कि बाढ़ और बारिश के बीच छत पर खाना बनाना और बच्चों को संभालना बेहद कठिन काम है। पानी उतरने पर डेंगू, मलेरिया और डायरिया जैसी बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। उनका अनुभव है कि नीचे बाढ़ का पानी और ऊपर से लगातार बारिश, ऐसी स्थिति में लोगों को कहीं और ठिकाना ढूँढने में भारी कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
बाढ़ समस्याओं का स्थायी समाधान जरूरी
कछार क्षेत्र के निवासी अब स्थायी समाधान की माँग कर रहे हैं। उनका कहना है कि प्रशासन यदि समय रहते राहत शिविर, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ और सुरक्षित आवागमन का इंतजाम करे, तो नुकसान को कम किया जा सकता है। मानसून से पहले ठोस तैयारी और प्रभावित इलाकों के लिए विशेष योजना बनाना ही इस विकराल समस्या का एकमात्र समाधान हो सकता है।

