Kochi News: केरल हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कानून के तहत ‘पब्लिक व्यू’ यानी सार्वजनिक दृष्टि की परिभाषा को काफी व्यापक बना दिया है। कोर्ट के मुताबिक अब प्राइवेट जगह भी इसके दायरे में आएगी।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी निजी स्थान या घर के आंगन में की गई जातिसूचक टिप्पणी भी कानूनी रूप से अपराध मानी जाएगी। बशर्ते घटना के समय वहां अन्य लोग मौजूद हों और उन्होंने अपमानजनक शब्द सुने हों। इस फैसले के बाद आरोपी निजी जगह का बहाना नहीं बना पाएंगे।
प्राइवेट स्पेस और पब्लिक व्यू में होता है बड़ा अंतर
जस्टिस ए. बदरुद्दीन की सिंगल बेंच ने इस मामले की विस्तृत कानूनी व्याख्या की है। कोर्ट ने कहा कि ‘सार्वजनिक रूप से दिखाई देने वाली जगह’ और ‘सार्वजनिक जगह’ दोनों बिल्कुल अलग बातें हैं। अगर किसी थर्ड पार्टी या बाहरी व्यक्ति की मौजूदगी में अपशब्द कहे जाएं, तो वह स्थान पब्लिक व्यू माना जाएगा।
अदालत ने एक और अहम कानूनी बिंदु को साफ किया है। यदि एक से अधिक आरोपी मिलकर किसी पीड़ित को डराने या नीचा दिखाने के इरादे से गाली-गलौज करते हैं, तो उनकी आपसी मौजूदगी को ही गवाह मान लिया जाएगा। ऐसी स्थिति में वह स्थान स्वतः ही सार्वजनिक दृष्टि के दायरे में शामिल हो जाएगा।
प्रथम दृष्टया अपराध सिद्ध होने पर अग्रिम जमानत से इनकार
इस कड़ी व्याख्या के साथ हाईकोर्ट ने मामले के दो मुख्य आरोपियों को एंटीसिपेटरी बेल यानी अग्रिम जमानत देने से साफ इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि केस में प्रथम दृष्टया अपराध बनता है। इसलिए एससी-एसटी संशोधन अधिनियम, 2018 की धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत पर पूर्ण रोक लागू होगी।
रिकॉर्ड के अनुसार दोनों पक्ष एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते हैं और उन्होंने काफी समय तक एक ही पॉलिटिकल पार्टी में साथ काम भी किया है। जब पहले मुख्य आरोपी ने सबके सामने पीड़ित महिला के लिए जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया, तो यह सीधे तौर पर धारा 3(1)(एस) का उल्लंघन है।
यह पूरा विवाद त्रिशूर जिले के वलप्पड पुलिस स्टेशन एरिया का है। आरोपी भागीश पूराधन और श्रीजीत ने अपने छह साथियों के साथ मिलकर शिकायतकर्ता के घर में घुसकर आंगन में धमकी दी थी। आरोपियों पर घर में विस्फोटक पदार्थ का इस्तेमाल करने और महिला को प्रताड़ित करने का भी गंभीर आरोप है।

