पश्चिम बंगाल में राज्यसभा उपचुनाव का ऐलान, टीएमसी के नाम और सिंबल पर चुनाव आयोग पर बढ़ा फैसला करने का दबाव

Kolkata News: पश्चिम बंगाल में तीन राज्यसभा सीटों के लिए होने वाले उपचुनाव के बिगुल फूंकने के साथ ही सियासी पारा चढ़ गया है। भारत निर्वाचन आयोग (ECI) पर इस समय तृणमूल कांग्रेस (TMC) के असली नाम और उसके पारंपरिक चुनाव चिह्न ‘जोड़ा फूल’ को लेकर अंतिम फैसला करने का बड़ा कूटनीतिक दबाव बन गया है।

- Advertisement -

पार्टी में मचे घमासान के बीच टीएमसी इस वक्त साफ तौर पर दो धड़ों में बंट चुकी है। एक गुट का नेतृत्व खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कर रही हैं, जबकि दूसरे बागी गुट की कमान पश्चिम बंगाल विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष रितब्रत बनर्जी के हाथों में है। दोनों ही गुट खुद को ‘असली टीएमसी’ बता रहे हैं।

तीन राज्यसभा सीटों पर आगामी 24 जुलाई को होगा मतदान

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के बाद टीएमसी के तीन सांसदों सुखेंदु शेखर रॉय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाईक के पिछले महीने इस्तीफे देने के कारण ये सीटें खाली हुई थीं। इन्हीं सीटों पर आगामी 24 जुलाई को उपचुनाव होने जा रहे हैं, जिसके लिए नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख 14 जुलाई तय की गई है।

वर्तमान में 294 सीटों वाली पश्चिम बंगाल विधानसभा के बड़े गणित को देखें तो मुख्य विपक्षी दल बीजेपी के पास 207 सीटें मौजूद हैं। ऐसे में राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से माना जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी इन तीनों रिक्त सीटों पर आसानी से बड़ी जीत दर्ज कर सकती है।

- Advertisement -

चुनाव आयोग के सामने फॉर्म 22A को लेकर फंसा तकनीकी पेंच

यदि 14 जुलाई तक दोनों गुटों ने अलग-अलग उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतारे, तो चुनाव आयोग को यह तय करना होगा कि टीएमसी का आधिकारिक प्रत्याशी कौन है। इस मामले में ‘फॉर्म 22A’ का भी एक बड़ा तकनीकी पेंच है, जिसके जरिए कोई भी राजनीतिक दल अपना अधिकृत पोलिंग एजेंट नियुक्त करता है।

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी के मुताबिक, ऐसी संभावना है कि चुनाव आयोग अंतिम फैसला आने तक टीएमसी के नाम और ‘जोड़ा फूल’ चुनाव चिह्न को पूरी तरह फ्रीज कर सकता है। इस दौरान दोनों ही गुटों को उपचुनाव के लिए अस्थायी नाम (जैसे- TMC-A और TMC-B) अलॉट किए जा सकते हैं।

बहुमत और पार्टी संविधान के आधार पर होगा असली गुट का फैसला

ममता गुट के वरिष्ठ सांसद कल्याण बनर्जी ने नेशनल वर्किंग कमेटी का कार्यकाल 2027 तक होने का हवाला देते हुए बागी गुट को पूरी तरह बेईमान बताया है। दूसरी तरफ रितब्रत बनर्जी ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि उनके पास दो-तिहाई से अधिक विधायकों, पूर्व मंत्रियों और पार्षदों का समर्थन है।

‘चुनाव चिह्न आदेश, 1968’ के सख्त नियमों के तहत किसी भी दल के असली होने का फैसला मुख्य रूप से तीन कड़े पैमानों—पार्टी का मूल संविधान, उसके उद्देश्य और विधायी बहुमत के आधार पर तय होता है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनी हैं और दस्तावेजों की जांच जारी है।

साल 2022 के ऐतिहासिक शिवसेना विवाद जैसा अपनाया जा सकता है रुख

राज्यसभा चुनाव के लिए किसी भी उम्मीदवार को प्रस्तावक के रूप में कम से कम 10 विधायकों के समर्थन की जरूरत होती है। वर्तमान संख्या बल के हिसाब से दोनों ही गुट स्वतंत्र उम्मीदवार उतारने की स्थिति में हैं। यदि 14 जुलाई तक आयोग किसी नतीजे पर नहीं पहुंचता, तो मामला सीधे कोर्ट जा सकता है।

इससे पहले साल 2022 में महाराष्ट्र के शिवसेना विवाद के दौरान भी चुनाव आयोग ने मूल सिंबल को फ्रीज कर दोनों गुटों को अस्थायी पहचान दी थी। बाद में विधायी बहुमत के आधार पर एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना माना गया था। टीएमसी के इस हाई-प्रोफाइल मामले में भी आयोग उसी तर्ज पर कदम उठा सकता है।

- Advertisement -

बड़ी खबरें

Topics

Related Articles