हिमाचल प्रदेश सरकार का बड़ा कदम, ऐतिहासिक होटल वाइल्डफ्लावर हॉल को पैंतीस साल की लीज पर देने के लिए ग्लोबल टेंडर जारी

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Shimla News: हिमाचल प्रदेश की सुक्खू सरकार ने राजधानी के नजदीक स्थित ऐतिहासिक और बेहद आलीशान होटल वाइल्डफ्लावर हॉल को लेकर एक बड़ा फैसला किया है। लंबे समय तक चली कानूनी लड़ाई को जीतने के बाद अब राज्य सरकार इस बेहद कीमती संपत्ति को पैंतीस साल की लंबी लीज पर देने जा रही है।

राज्य के पर्यटन एवं नागरिक उड्डयन विभाग ने इस शानदार हेरिटेज प्रॉपर्टी को चलाने और इसके रखरखाव के लिए वैश्विक स्तर पर टेंडर जारी कर दिए हैं। समंदर तल से आठ हजार फीट से अधिक की ऊंचाई पर स्थित इस नामी रिसॉर्ट को हासिल करने के लिए दुनिया की बड़ी कंपनियां रेस में शामिल होंगी।

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इच्छुक कंपनियों को जमा करनी होगी चौबीस करोड़ रुपये की भारी सुरक्षा राशि

इस वीआईपी टेंडर प्रक्रिया का हिस्सा बनने के लिए सभी इच्छुक कंपनियों को चौबीस करोड़ रुपये की बिड सिक्योरिटी राशि जमा करनी होगी। इसके अलावा टेंडर के लिए जरूरी दस्तावेजों की कीमत भी पांच लाख रुपये तय की गई है। सरकार को इस लक्जरी रिसॉर्ट से बहुत बड़े राजस्व की उम्मीद है।

आगामी एक जुलाई को प्री-बिड कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया जाएगा और ठीक चौबीस जुलाई को सभी तकनीकी बोलियां खोली जाएंगी। इसके बाद आगामी बाईस अगस्त को सफल बोलीदाता के नाम का आधिकारिक ऐलान होने की पूरी संभावना है, जिससे होटल को नया ऑपरेटर मिल जाएगा।

लॉर्ड किचनर द्वारा निर्मित इस आलीशान संपत्ति का रहा है शानदार इतिहास

इस पांच सितारा लक्जरी होटल के भीतर कुल पचासी कमरे बने हुए हैं। इनमें स्पा, स्विमिंग पूल, जिम और बड़े बैंक्वेट हॉल जैसी तमाम आधुनिक और आलीशान सुविधाएं मौजूद हैं। लगभग सतहत्तर हजार वर्ग मीटर के इस बड़े परिसर में देवदार के बाईस सौ से अधिक पुराने पेड़ मौजूद हैं।

इस ऐतिहासिक भवन का निर्माण साल 1902 में ब्रिटिश सेना के कमांडर-इन-चीफ लॉर्ड किचनर ने करवाया था। देश की आजादी के बाद यह शानदार जगह केंद्र सरकार के पास रही और बाद में इसे हिमाचल प्रदेश पर्यटन विकास निगम को पूरी तरह से ट्रांसफर कर दिया गया था।

दो दशक पुरानी कानूनी लड़ाई के बाद सरकार को मिला था मालिकाना हक

साल 1993 में लगी एक भीषण आग के कारण यह ऐतिहासिक मुख्य इमारत पूरी तरह से जलकर खाक हो गई थी। इसके बाद हिमाचल सरकार ने मशहूर ओबेरॉय ग्रुप की मूल कंपनी के साथ मिलकर इसके पुनर्निर्माण के लिए एक खास समझौता किया था, जो बाद में विवादों में घिर गया।

यह कानूनी विवाद हिमाचल हाईकोर्ट से होते हुए देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंचा था। इसी साल सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के पक्ष में अपना अंतिम फैसला सुनाया था। वर्तमान में नई लीज प्रक्रिया पूरी होने तक ओबेरॉय ग्रुप ही इसका टेंपरेरी संचालन कर रहा है।

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