Entertainment News: हिंदी सिनेमा के स्वर्ण युग के सबसे मखमली आवाज वाले गायक मोहम्मद रफी साहब के हर गीत में एक अलग ही सुकून होता था। उनके गाए गीतों में एक ऐसा ही सदाबहार गाना है, ‘तेरी प्यारी प्यारी सूरत को किसी की नजर न लगे, चश्मे बद्दूर’। इस गाने के पीछे की कहानी किसी फिल्मी किस्से से कम दिलचस्प नहीं है।
इस गाने की धुन का जन्म भारत में नहीं बल्कि एक विदेशी सरजमीं पर हुआ था। दिग्गज संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन उन दिनों मिडिल ईस्ट के एक देश में छुट्टियां बिता रहे थे। एक शाम जब वे भोजन कर रहे थे, तब वहां एक बुजुर्ग महिला आई और उन्होंने जयकिशन से ‘चश्मे बद्दूर’ शब्द कहा। यह शब्द जयकिशन के जेहन में हमेशा के लिए बैठ गया।
‘चश्मे बद्दूर’ का अनोखा अर्थ
मुंबई लौटने के बाद जयकिशन ने तुरंत गीतकार हसरत जयपुरी से इस शब्द के बारे में पूछा। हसरत ने बताया कि ‘चश्मे बद्दूर’ का मतलब होता है—’ईश्वर आपको बुरी नजर से बचाए’। यह अर्थ सुनते ही जयकिशन की आंखें चमक उठीं और उन्होंने ठान लिया कि वे इस खूबसूरत दुआ को अपने किसी आने वाले गाने में जरूर इस्तेमाल करेंगे।
साल 1961 में आई फिल्म ‘ससुराल’ के लिए हसरत जयपुरी ने वो अमर पंक्तियां लिखीं, ‘तेरी प्यारी प्यारी सूरत को किसी की नजर न लगे, चश्मे बद्दूर’। जब रफी साहब ने अपनी मखमली आवाज में इसे रिकॉर्ड किया, तो यह गाना मात्र एक फिल्मी गीत न रहकर एक ऐसी दुआ बन गया जो आज भी लोगों की जुबान पर है।
स्टेज पर रफी साहब का जादू
यह गाना इतना लोकप्रिय हुआ कि 1962 में इसे फिल्मफेयर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। मोहम्मद रफी जब भी स्टेज पर इस गाने को गाते थे, तो श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते थे। लोगों को महसूस होता था कि रफी साहब उनके लिए व्यक्तिगत रूप से यह दुआ गा रहे हैं। आज भी यह गीत संगीत प्रेमियों के कानों में रस घोल देता है।
रफी साहब की सादगी और शंकर-जयकिशन का संगीत मिलकर इस गीत को क्लासिक बनाते हैं। यह किस्सा याद दिलाता है कि कैसे छोटी-छोटी घटनाएं और शब्द कालजयी गीतों को जन्म देते हैं। आज भी जब यह गाना बजता है, तो पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं और रफी साहब की जादुई आवाज हर दिल को छू लेती है।
Author: Manisha Thakur
