Himachal News: हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि एक मां और गृहिणी के बहुआयामी कार्यों को केवल आर्थिक पैमाने पर नहीं मापा जा सकता। वे समाज और देश के लिए मानव मूल्य तैयार करने की सबसे मजबूत नींव रखती हैं।
अदालत ने इसी महत्वपूर्ण सिद्धांत के आधार पर श्रीराम जनरल इंश्योरेंस कंपनी की अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया। कोर्ट ने सड़क दुर्घटना में जान गंवाने वाली एक महिला के बेटों के लिए तय मुआवजा राशि को पांच गुना से भी अधिक बढ़ा दिया है।
बीमा कंपनी की याचिका खारिज और मुआवजा राशि में ऐतिहासिक बढ़ोतरी
यह बड़ा निर्णय न्यायाधीश विरेंदर सिंह की एकल पीठ ने सुनाया। साल 2013 में एक दर्दनाक सड़क हादसे में 55 वर्षीय सरिता देवी की मौत हो गई थी। इसके बाद मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल कांगड़ा ने साल 2018 में मृतका के दो बेटों के पक्ष में मुआवजा मंजूर किया था।
बीमा कंपनी ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। कंपनी का तर्क था कि महिला के दोनों बेटे बालिग, शादीशुदा और नौकरीपेशा हैं। वे अपनी मां पर आर्थिक रूप से निर्भर नहीं थे। इसलिए उन्हें आजीविका के नुकसान का लाभ नहीं मिलना चाहिए।
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए बीमा कंपनी के इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि बालिग और कमाऊ बेटे भी कानूनी प्रतिनिधि होने के नाते उचित क्लेम पाने के हकदार हैं।
काल्पनिक आय की गणना में बड़ा बदलाव और अंतिम आदेश
उच्च न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया कानूनी दिशा-निर्देशों के आधार पर मुआवजे की नई गणना की। ट्रिब्यूनल ने पहले महिला का मासिक काल्पनिक योगदान बेहद कम आंका था। हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की नजीर के तहत इसे बढ़ाकर सीधे 30,000 रुपये प्रति माह तय किया।
महिला की उम्र 55 वर्ष होने के कारण स्थापित आय में 10 प्रतिशत की अतिरिक्त बढ़ोतरी जोड़ी गई, जिससे कुल मासिक आय 33,000 रुपये हो गई। कोर्ट ने ट्रिब्यूनल द्वारा तय 5,58,000 रुपये के कुल मुआवजे को बढ़ाकर 30,47,000 रुपये करने का अंतिम आदेश दिया।

