Mumbai News: ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के कारण ग्लोबल स्टॉक मार्केट और भारतीय रुपये पर दबाव देखा जा रहा था। विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) तेजी से बाजार से पैसा निकाल रहे थे। इसी बीच रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (आरबीआई) के हालिया डेटा ने देश की इकोनॉमी के लिए एक बेहद सुखद संकेत दिया है।
आरबीआई के मुताबिक, अप्रैल महीने में भारत में आने वाला प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई), देश से बाहर जाने वाले आउटफ्लो के मुकाबले 6.6 अरब डॉलर अधिक रहा है। यह पिछले 5 सालों का सबसे ऊंचा स्तर है। इसके साथ ही ग्रॉस एफडीआई में पिछले साल की तुलना में 17 फीसदी की रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
एफआईआई और एफडीआई में क्या होता है मुख्य अंतर?
आसान शब्दों में कहें तो एफआईआई (FIIs) के तहत विदेशी निवेशक शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड्स और बॉन्ड्स में शॉर्ट टर्म के लिए पैसा लगाते हैं। इसके विपरीत, एफडीआई (FDI) के तहत विदेशी कंपनियां भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर, मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स और फैक्ट्रियों में डायरेक्ट फिजिकल इन्वेस्टमेंट करती हैं। एफडीआई लंबे समय का निवेश होता है, जो देश के विकास में मुख्य भूमिका निभाता है।
बीते 6 वर्षों का एफडीआई फ्लो और रुपये में इसकी वैल्यू
विदेशी निवेशकों का भारत के डोमेस्टिक कंजम्पशन और इंफ्रास्ट्रक्चर पर भरोसा लगातार मजबूत हो रहा है, जिसे हम इस टेबल के जरिए आसानी से समझ सकते हैं: फाइनेंशियल ईयर एफडीआई प्रवाह (डॉलर में) भारतीय रुपये में वैल्यू FY 2025-26 $94.50 अरब ₹89.17 लाख करोड़ FY 2024-25 $81.04 अरब ₹76.47 लाख करोड़ FY 2023-24 $71.28 अरब ₹67.26 लाख करोड़ FY 2022-23 $71.00 अरब ₹67.00 लाख करोड़ FY 2021-22 $83.57 अरब ₹78.86 लाख करोड़ FY 2020-21 $81.97 अरब ₹77.35 लाख करोड़
वित्त वर्ष 2024-25 में जहां एफडीआई प्रवाह में 14 फीसदी की तेजी आई थी, वहीं वित्त वर्ष 2025-26 में यह आंकड़ा 17 फीसदी की रिकॉर्ड ग्रोथ दर्ज कर चुका है।
एफडीआई बढ़ने से देश की अर्थव्यवस्था को मिलने वाले बड़े फायदे
जब कोई ग्लोबल कंपनी भारत में लंबे समय के लिए बड़ा कैपिटल लाती है, तो देश के आर्थिक ढांचे में कई सकारात्मक बदलाव देखने को मिलते हैं:
- रोजगार और जीडीपी ग्रोथ: नई फैक्ट्रियां और ऑफिस खुलने से युवाओं के लिए डायरेक्ट और इनडायरेक्ट जॉब्स के लाखों नए अवसर पैदा होते हैं।
- मॉडर्न टेक्नोलॉजी ट्रांसफर: विदेशी कंपनियां अपने साथ एडवांस्ड मशीनरी, ग्लोबल वर्किंग सिस्टम और हाईटेक मैनेजमेंट लाती हैं, जिससे लोकल वर्कर्स स्किल्ड होते हैं।
- मजबूत फॉरेक्स रिजर्व: बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन होने से एक्सपोर्ट बढ़ता है, जिससे देश का विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होता है और रुपया डॉलर के मुकाबले संभलता है।
- टैक्स रेवेन्यू में बढ़ोतरी: नई कॉर्पोरेट कंपनियों के आने से सरकार को जीएसटी और डायरेक्ट टैक्स के रूप में बड़ा रेवेन्यू मिलता है, जो पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर में काम आता है।
विदेशी फंड्स को आकर्षित करने के लिए आरबीआई और सरकार के बड़े कदम
आरबीआई और केंद्र सरकार ने भारत में डॉलर का फ्लो बढ़ाने के लिए कई नियमों को बेहद आसान कर दिया है। विदेशी संस्थागत निवेशकों के लिए सरकारी बॉन्ड्स पर लगने वाले लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स को पूरी तरह खत्म कर दिया गया है। इसके अलावा प्रवासियों (NRI और OCI) के लिए स्टॉक मार्केट में इन्वेस्टमेंट लिमिट को काफी बढ़ा दिया गया है।
ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म मॉर्गन स्टेनली का अनुमान है कि इन नए आर्थिक सुधारों के चलते अगले एक साल में भारत में 40 अरब डॉलर से 60 अरब डॉलर तक का एक्स्ट्रा विदेशी फंड आ सकता है। यह अतिरिक्त डॉलर फ्लो भारत के बैलेंस ऑफ पेमेंट्स को घाटे से बचाएगा और इंटरनेशनल मार्केट में रुपये की साख मजबूत करेगा।
चीन, वियतनाम और आयरलैंड ने एफडीआई से बदली अपनी किस्मत
दुनिया की कई बड़ी महाशक्तियों ने विदेशी पूंजी का सही इस्तेमाल कर अपनी जीडीपी को आसमान पर पहुंचाया है, जिसके तीन प्रमुख उदाहरण इस प्रकार हैं:
- चीन: साल 2026 के शुरुआती पांच महीनों में चीन के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 12.8 बिलियन डॉलर का एफडीआई आया है, जिसने उनके इंडस्ट्रियल स्ट्रक्चर को सुपर-एडवांस्ड बनाया है।
- वियतनाम: वियतनाम के कुल इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट का करीब 98% हिस्सा विदेशी कंपनियों का है। अकेले सैमसंग कंपनी की कमाई वियतनाम की टोटल जीडीपी का 13 फीसदी है।
- आयरलैंड: आयरलैंड के प्राइवेट सेक्टर की 20% नौकरियां एफडीआई से आती हैं। गूगल, एप्पल और मेटा जैसी दिग्गज अमेरिकी कंपनियों ने आयरलैंड को अपना ग्लोबल रिसर्च हब बनाया हुआ है।

