चीन सीमा से सटे नेपाल के मुस्तांग में यूरेनियम भंडार, अमेरिका-ऑस्ट्रेलिया को सौंपने की तैयारी?

Nepal News: नेपाल के मुस्तांग क्षेत्र में स्थित यूरेनियम भंडार को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गहमागहमी शुरू हो गई है। चर्चा है कि नेपाल सरकार ‘लो मान्थांग’ के पास 30 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को ‘मुस्तांग स्पेशल जोन’ घोषित कर सकती है। इस यूरेनियम की प्रोसेसिंग का जिम्मा अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया को दिए जाने की संभावना जताई जा रही है। यह इलाका चीन की सीमा से बेहद करीब है, जिससे क्षेत्र में भू-राजनीतिक तनाव बढ़ सकता है।

मुस्तांग का यूरेनियम: आकार, ग्रेड और रणनीतिक अहमियत

मुस्तांग का यूरेनियम भंडार करीब दस किलोमीटर लंबा और तीन किलोमीटर चौड़ा बताया जा रहा है। वैज्ञानिक इस खनिज को ‘मीडियम ग्रेड’ का मानते हैं। यह ग्रेड परमाणु ऊर्जा संयंत्रों और रणनीतिक हथियारों के लिए बेहद कीमती होता है। नेपाल के पास इस यूरेनियम को निकालने की तकनीक और वित्तीय संसाधन नहीं हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका ‘एमसीसी प्रोजेक्ट’ के जरिए नेपाल में अपनी पैठ पहले ही मजबूत कर चुका है। अब उसकी नजर इस रणनीतिक खनिज पर है। अगर अमेरिका यहां सक्रिय होता है, तो हिमालयी क्षेत्र में शक्ति संतुलन बदल सकता है।

‘पैक्स सिलिका’ गठबंधन और गोपनीय समझौते की चर्चा

रिपोर्ट्स के अनुसार, ‘पैक्स सिलिका’ नामक गठबंधन चीन के खनिज वर्चस्व को चुनौती देने के लिए अमेरिका के नेतृत्व में बनाया गया है। दावा है कि मार्च 2026 के चुनावों के दौरान एक गोपनीय सहमति बनी थी। इस समझौते के तहत मुस्तांग में यूरेनियम निकालने के लिए अमेरिकी और ऑस्ट्रेलियाई टीमों को विशेष अधिकार दिए जाएंगे। हालांकि, नेपाल के कई शीर्ष अधिकारियों और पूर्व मंत्रियों ने सार्वजनिक रूप से इस तरह के किसी भी समझौते से इनकार किया है। इस इनकार ने पूरे मामले को और रहस्यमयी बना दिया है।

भारत और चीन क्यों हैं चिंतित?

मुस्तांग की यूरेनियम खदान चीन की सीमा से महज दस किलोमीटर दूर स्थित है। अगर नेपाल यह प्रोजेक्ट अमेरिका को सौंपता है, तो चीन इसे अपनी सुरक्षा के लिए सीधा खतरा मानेगा। वहीं, भारत के लिए भी अपने पड़ोसी देश में किसी तीसरी शक्ति की सैन्य या तकनीकी दखलंदाजी चिंता का विषय है। नेपाल हमेशा से भारत और चीन के बीच एक ‘बफर स्टेट’ रहा है। यूरेनियम के इस मुद्दे ने इस क्षेत्र को वैश्विक शक्तियों के खेल का मैदान बना दिया है।

एमसीसी प्रोजेक्ट और डेटा संप्रभुता का लिंक

नेपाल में 2017 से चल रहे अमेरिकी ‘एमसीसी प्रोजेक्ट’ को लेकर पहले ही काफी विरोध हो चुका है। अब चर्चा है कि इसी प्रोजेक्ट से मिलने वाली बिजली का उपयोग मुस्तांग में यूरेनियम प्रोसेसिंग के लिए किया जाएगा। साथ ही नए एआई डेटा केंद्रों को चलाने के लिए भी यह बिजली काम आएगी। ‘डिजिटल हैश’ और डेटा संप्रभुता जैसे तकनीकी शब्दों के इस्तेमाल से संकेत मिलता है कि यह सिर्फ खनिज का मामला नहीं है। यह भविष्य की तकनीक और निगरानी तंत्र पर नियंत्रण पाने की एक बड़ी योजना का हिस्सा हो सकता है।

नेपाल सरकार और बालेन शाह का रुख

नेपाल की राजनीति में इस मुद्दे पर साफ सहमति नहीं बन पाई है। जहां पुरानी पीढ़ी के नेता किसी भी समझौते से इनकार कर रहे हैं, वहीं बालेन शाह जैसे उभरते नेताओं और राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के बढ़ते प्रभाव के बीच नई विदेश नीति के कयास लगाए जा रहे हैं। अगर नेपाल सरकार इस क्षेत्र को ‘उच्च-सुरक्षा अनुसंधान क्षेत्र’ घोषित करती है, तो वहां बाहरी लोगों का प्रवेश वर्जित हो जाएगा। इससे यूरेनियम निष्कर्षण की प्रक्रिया को गोपनीयता के साथ आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी। इसका सीधा असर नेपाल के पड़ोसी देशों के साथ संबंधों पर पड़ेगा।

बालेन शाह का भारत दौरा: सिर्फ फोटो खिंचवाने नहीं आएंगे

भारत दौरे से पहले नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने कई शर्तें रखी हैं। उन्होंने साफ कहा कि वह सिर्फ फोटो खिंचवाने के लिए भारत नहीं आएंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के न्योते को उन्होंने स्वीकार कर लिया है। लेकिन इस दौरे पर वह दोनों देशों के बीच महत्वपूर्ण मुद्दों पर ठोस बातचीत करना चाहते हैं। उनके इस रुख से नेपाल-भारत संबंधों में नई हलचल की उम्मीद है। हालांकि, अभी तक मुस्तांग यूरेनियम मुद्दे को लेकर उनकी सरकार की कोई आधिकारिक टिप्पणी सामने नहीं आई है।

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