सुप्रीम कोर्ट के एक सख्त आदेश से केंद्र सरकार में मचा भारी हड़कंप, केंद्रीय गृह सचिव को किया गया तलब, जानें पूरा मामला

India News: देश की सर्वोच्च अदालत ने पुलिस थानों की सुरक्षा को लेकर एक बहुत बड़ा कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने सीसीटीवी कैमरे लगाने के मामले में केंद्रीय गृह सचिव को सीधे तलब किया है। अदालत ने साफ आदेश दिया है कि गृह सचिव मंगलवार को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश हों। कोर्ट के इस कड़े रुख से पूरे प्रशासनिक हलकों में अचानक भारी हड़कंप मच गया है। केंद्र सरकार अब कोर्ट में अपना पक्ष रखने की पूरी तैयारी कर रही है।

क्यों किया गया है गृह सचिव को तलब?

सुप्रीम कोर्ट पुलिस थानों में काम न करने वाले सीसीटीवी कैमरों को लेकर बहुत ज्यादा गंभीर है। कोर्ट ने देश भर के थानों में कैमरों की खराब स्थिति और उनकी निगरानी में कमियों पर कड़ी आपत्ति जताई है। अदालत यह जानना चाहती है कि उसके पुराने सख्त आदेशों का पूरी तरह से पालन क्यों नहीं हो रहा है। शीर्ष अदालत ने इस अहम योजना को जमीन पर उतारने के लिए केंद्रीय गृह सचिव से जवाब मांगा है।

हिरासत में मौतों के बाद उठाया गया कदम

शीर्ष अदालत ने यह कार्रवाई मीडिया में आई कई चौंकाने वाली रिपोर्टों के बाद की है। कुछ समय पहले रिपोर्ट आई थी कि साल दो हजार पच्चीस में पुलिस हिरासत में ग्यारह मौतें हुई हैं। इन मौतों ने न्यायपालिका और मानवाधिकार संगठनों को पूरी तरह से झकझोर कर रख दिया था। इसके बाद शीर्ष अदालत ने खुद संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका शुरू की थी। अदालत का साफ मानना है कि कैमरों की कमी से पुलिस की जवाबदेही तय नहीं हो रही है।

चीनी कंपनियों के कैमरों पर पूछे तीखे सवाल

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने केंद्र सरकार के वकील से कई तीखे सवाल किए। पीठ ने मीडिया में आई उस खबर का भी जिक्र किया जिसमें चीनी कंपनियों के सीसीटीवी कैमरों को हटाने की बात कही गई थी। सरकार सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए कई अहम स्थानों से चीनी कैमरों को हटा रही है। कोर्ट ने इस मुद्दे पर भी सरकार से स्थिति स्पष्ट करने और अपनी एक विस्तृत रिपोर्ट पेश करने को कहा है।

केंद्रीय जांच एजेंसियों पर भी लागू है आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने साल दो हजार बीस में इस मामले में एक बहुत ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। उस फैसले में देश के सभी पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाना पूरी तरह अनिवार्य कर दिया गया था। इसके साथ ही सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय और राष्ट्रीय जांच एजेंसी जैसे बड़े दफ्तरों में भी कैमरे लगाने के कड़े निर्देश दिए गए थे। कोर्ट का मुख्य मकसद यह सुनिश्चित करना था कि पूछताछ के दौरान आरोपियों के साथ कोई भी हिंसा या प्रताड़ना न हो।

पारदर्शी जांच के लिए सीसीटीवी की भारी अहमियत

न्यायपालिका का साफ मानना है कि पुलिस और जांच एजेंसियों की कार्रवाई पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए। थानों के एंट्री गेट, लॉक-अप, गलियारों और रिसेप्शन पर कैमरे लगाना बहुत ज्यादा जरूरी है। इन सभी कैमरों में नाइट विजन और ऑडियो रिकॉर्डिंग की सुविधा भी हर हाल में होनी चाहिए। कोर्ट यह सुनिश्चित करना चाहता है कि पुलिस हिरासत में किसी भी व्यक्ति के मानवाधिकारों का उल्लंघन न हो और हर आपराधिक घटना की पूरी तरह से निष्पक्ष जांच हो सके।

केंद्र और राज्य सरकारों पर बना भारी दबाव

सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा आदेश ने केंद्र और राज्य दोनों सरकारों पर भारी दबाव बना दिया है। अदालत ने पहले ही सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कड़े निर्देश दिए थे कि वे एक साल तक डेटा स्टोर करने वाले कैमरे खरीदें। अब गृह सचिव की अदालत में पेशी के बाद यह तय होगा कि इस दिशा में आगे क्या कदम उठाए जाएंगे। शीर्ष अदालत अब इस मामले में किसी भी तरह की लापरवाही को बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं करेगी।

सेंट्रलाइज्ड डैशबोर्ड बनाने की तैयारी में है सरकार

शीर्ष अदालत ने इस साल फरवरी में भी केंद्र सरकार को एक महत्वपूर्ण निर्देश दिया था। अदालत ने सभी संबंधित पक्षों को एक विशेष बैठक बुलाने का आदेश दिया था। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य पूरे देश के थानों के लिए एक सेंट्रलाइज्ड डैशबोर्ड तैयार करना था। इसके अलावा थानों में सीसीटीवी के बुनियादी ढांचे का मानकीकरण भी किया जाना है। इस तकनीक की मदद से देश के किसी भी थाने की निगरानी सीधे दिल्ली से बहुत आसानी से की जा सकेगी।

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