National News: आज के दौर में हमारे घरों के भीतर एक बहुत गहरी और अजीब सी खामोशी छा गई है। यह खामोशी शांति की नहीं, बल्कि डिजिटल स्क्रीन्स की देन है। एक वक्त था जब शाम होते ही गलियों में बच्चों का शोर गूंजता था। धूल में सने बच्चे भागते-दौड़ते नजर आते थे और उनकी हंसी से घर आंगन आबाद रहते थे। अब वह दौर पूरी तरह से बदल गया है। आज के बच्चे घर की चारदीवारी में कैद होकर रह गए हैं। उनकी पूरी दुनिया अब एक छोटी सी चमकदार स्क्रीन तक सिमट गई है। मोबाइल, टीवी और टैबलेट उनके नए सबसे अच्छे दोस्त बन गए हैं।
इसके साथ ही उनकी थाली में पिज्जा, बर्गर और चिप्स ने पक्की जगह बना ली है। जंक फूड और डिजिटल स्क्रीन की यह जुगलबंदी बच्चों की सेहत को दीमक की तरह चाट रही है। बचपन का मोटापा आज एक बड़ी और गंभीर महामारी बन चुका है। यह कोई मामूली बात नहीं है जिसे हम नजरअंदाज कर दें। यह आने वाले कल में डायबिटीज और दिल की बीमारियों का सीधा न्यौता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े डराने वाले हैं। बच्चों में मोटापे के मामले पिछले कुछ सालों में कई गुना बढ़ चुके हैं। हमें इस मंडराते खतरे को आज ही समझना होगा।
डिजिटल स्क्रीन ने कैसे छीन लिया बचपन का मैदान
आधुनिक जीवनशैली ने बच्चों से उनके खेलने के मैदान बेरहमी से छीन लिए हैं। अब बच्चे बाहर जाकर पसीना नहीं बहाते हैं। वे सोफे पर बैठकर वीडियो गेम खेलते हैं और वर्चुअल दुनिया में जीत का जश्न मनाते हैं। सबसे बड़ी समस्या तब शुरू होती है जब खाने का वक्त होता है। आजकल बिना मोबाइल देखे बच्चों के गले से निवाला नीचे नहीं उतरता है। महानगरों की भागदौड़ भरी जिंदगी में माता-पिता दोनों काम पर जाते हैं। ऐसे में बच्चों को चुप कराने के लिए मोबाइल को एक खिलौने की तरह थमा दिया जाता है।
जब बच्चे स्क्रीन देखते हुए खाना खाते हैं, तो उनका पूरा ध्यान उसी वीडियो में होता है। ऐसे में उनका दिमाग पेट भरने का कोई संकेत नहीं दे पाता है। वे खाने के स्वाद और शरीर की जरूरत को पूरी तरह भूल जाते हैं। इसके नतीजे में वे अपनी भूख से बहुत ज्यादा खाना खा लेते हैं। बिना ध्यान के खाया गया यह खाना सीधे मोटापे को जन्म देता है।
माता-पिता को अक्सर लगता है कि बच्चा शांति से एक जगह बैठकर खा रहा है। लेकिन असल में वह एक गंभीर बीमारी की मजबूत नींव रख रहा होता है। शारीरिक गतिविधि बिल्कुल शून्य हो चुकी है। शरीर में जा रही भारी कैलोरी बर्न नहीं हो रही है। यही जमा हुई कैलोरी मोटापे के रूप में बच्चों के शरीर पर बाहर आती है। यह एक ऐसा खतरनाक चक्र है जो लगातार बच्चों को अपनी गिरफ्त में ले रहा है।
जंक फूड के विज्ञापनों का मायाजाल और बच्चों की जिद
आजकल टीवी और इंटरनेट पर विज्ञापनों की भारी बाढ़ आई हुई है। जंक फूड बनाने वाली बड़ी कंपनियां बच्चों के मनोविज्ञान को बहुत अच्छे से समझती हैं। वे अपने विज्ञापनों को बेहद चमकदार और आकर्षक बनाती हैं। बच्चों के पसंदीदा कार्टून कैरेक्टर इन विज्ञापनों में चिप्स और कोल्ड ड्रिंक बेचते नजर आते हैं। इन विज्ञापनों को देखकर बच्चे तुरंत उसी खाने की जिद करने लगते हैं। जब माता-पिता बच्चों को बाजार लेकर जाते हैं, तो वे उन्हीं पैकेटबंद चीजों की ओर भागते हैं।
सुपरमार्केट में भी ऐसी चीजें बच्चों की आंखों के ठीक सामने रखी जाती हैं। यह एक सोची-समझी व्यावसायिक रणनीति है जिसका सीधा शिकार मासूम बच्चे हो रहे हैं। स्क्रीन और जंक फूड दोनों का सीधा असर बच्चों के नाजुक दिमाग पर पड़ता है। इन दोनों चीजों से दिमाग में डोपामिन नाम का हार्मोन बड़ी मात्रा में निकलता है। यह एक ‘फील गुड’ हार्मोन है जो नकली खुशी का अहसास कराता है। धीरे-धीरे बच्चों को इस नकली खुशी की लत लग जाती है।
वे बार-बार वही खुशी महसूस करने के लिए जंक फूड मांगते हैं। घर का बना ताजा और पौष्टिक खाना उन्हें बिल्कुल बेस्वाद लगने लगता है। उनकी खाने की पसंद पूरी तरह से बदल जाती है और वे हरी सब्जियों से दूर भागते हैं। यह उनके शारीरिक और मानसिक विकास के लिए एक बहुत बड़ा खतरा है।
नींद की चोरी और बीमारियों की दस्तक
देर रात तक मोबाइल या टीवी देखना आज हर घर की एक आम बात हो गई है। यह बुरी आदत बच्चों की कीमती नींद चुरा रही है। डिजिटल स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी नींद लाने वाले हार्मोन को रोक देती है। नींद पूरी न होने का सीधा असर शरीर के वजन और मेटाबॉलिज्म पर पड़ता है। जब बच्चों की नींद पूरी नहीं होती है, तो शरीर में घ्रेलिन नाम का हार्मोन काफी बढ़ जाता है। यह हार्मोन हमारी भूख को तेजी से बढ़ाता है। ऐसे में थके हुए और चिड़चिड़े बच्चे मीठी और अनहेल्दी चीजें खाना ज्यादा पसंद करते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के हालिया शोध इस खतरे की ओर बार-बार इशारा कर रहे हैं। दुनिया भर में लाखों बच्चे आज मोटापे का बुरी तरह शिकार हैं। पहले जो बीमारियां साठ साल की उम्र में होती थीं, वे आज पंद्रह साल के बच्चों में दिख रही हैं। आज छोटे बच्चों में कोलेस्ट्रॉल और हाई ब्लड शुगर की समस्या आम हो रही है।
यह हमारे समाज के लिए एक बहुत बड़ा अलार्म है। बच्चों का मोटापा सिर्फ दिखने में खराब नहीं लगता है। यह भविष्य में होने वाली बेहद गंभीर बीमारियों का पहला बड़ा लक्षण है। फैटी लीवर, टाइप 2 डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर अब सीधे बच्चों पर हमला कर रहे हैं। हमें इस कड़वी सच्चाई को स्वीकार करना होगा और तुरंत ठोस कदम उठाने होंगे।
माता-पिता के लिए एक जरूरी संदेश और सुधार के रास्ते
इस विकराल समस्या का समाधान किसी बाजार में नहीं, बल्कि हमारे अपने घरों में ही मौजूद है। माता-पिता को बच्चों के लिए कुछ नए और सख्त नियम बनाने होंगे। लेकिन यह काम डांट-डपट से नहीं, बल्कि प्यार और समझदारी से करना होगा। सबसे पहले बच्चों के स्क्रीन टाइम को सख्ती से सीमित करना बहुत जरूरी है। छोटे बच्चों को पूरे दिन में एक घंटे से ज्यादा स्क्रीन बिल्कुल नहीं देखनी चाहिए। खाना खाते समय घर में कोई भी सदस्य टीवी या मोबाइल नहीं देखेगा। यह नियम सिर्फ बच्चों के लिए नहीं, बल्कि घर के हर बड़े सदस्य के लिए होना चाहिए।
माता-पिता को खुद बच्चों के सामने एक सही रोल मॉडल बनना होगा। अगर आप खुद मोबाइल देखते हुए खाना खाएंगे, तो बच्चा भी आपकी ही नकल करेगा। घर के डाइनिंग टेबल पर हमेशा ताजे फल, सब्जियां और हेल्दी स्नैक्स सजाकर रखें। पैकेटबंद जंक फूड को घर के राशन की पर्ची से धीरे-धीरे बाहर निकाल दें। परिवार के सभी सदस्यों के साथ एक मेज पर बैठकर खाना खाने की आदत डालें।
खाने की मेज पर दिन भर की अच्छी बातें करें और बच्चों को सुनें। इससे बच्चों का ध्यान मोबाइल से हटेगा और वे परिवार से जुड़ेंगे। छुट्टी के दिन बच्चों को अपने साथ रसोई में लेकर जाएं और उन्हें खाना बनाना सिखाएं। जब बच्चे खुद अपने हाथों से कुछ बनाते हैं, तो वे उसे पूरी खुशी से खाते हैं।
खेलकूद और शारीरिक मेहनत की वापसी बेहद जरूरी
बच्चों को दोबारा बाहर खेल के मैदान तक ले जाना हम सबकी बड़ी जिम्मेदारी है। उन्हें रोजाना कम से कम एक घंटा घर से बाहर खेलने के लिए प्रेरित करें। साइकिल चलाना, पार्क में दौड़ना या कोई भी आउटडोर गेम खेलना उनके रूटीन का हिस्सा होना चाहिए। जब वे शारीरिक मेहनत करेंगे, तो शरीर की अतिरिक्त कैलोरी तेजी से जलेगी। इससे न सिर्फ उनका वजन कंट्रोल में रहेगा, बल्कि उनका दिमाग भी तेज होगा।
बाहर खेलने से बच्चों में सामाजिक कौशल भी विकसित होता है और वे नए दोस्त बनाते हैं। वे हार-जीत सीखते हैं और टीम में एक साथ काम करना सीखते हैं। आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में माता-पिता के पास समय की भारी कमी हो सकती है। लेकिन बच्चों के स्वास्थ्य से बढ़कर इस दुनिया में कुछ भी नहीं है। हमें उनके लिए अपना कीमती समय हर हाल में निकालना ही होगा।
जंक फूड और डिजिटल स्क्रीन की यह खतरनाक जोड़ी बहुत तेजी से अपना काम कर रही है। हमें भी उसी तेजी से अपने बच्चों को बचाने के लिए आगे आना होगा। थोड़ी सी समझदारी और सही आदतों के निर्माण से हम इस बड़े खतरे को टाल सकते हैं। बच्चों का स्वस्थ और सुरक्षित भविष्य हमारे आज के लिए गए फैसलों पर ही निर्भर करता है।

