अमेरिका और ईरान में शांति समझौते के बाद बड़ा उलटफेर, स्विट्जरलैंड वार्ता टली, जानें भारत पर क्या होगा असर

New Delhi News: अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध समाप्त करने के लिए 14 सूत्रीय ऐतिहासिक शांति समझौता हो चुका है। हालांकि, स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टाक रिजॉर्ट में शुक्रवार (19 जून) को होने वाली दोनों देशों की उच्च स्तरीय वार्ता अचानक टल गई है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस का दौरा रद्द होने से यह बैठक स्थगित हुई है। लेकिन इस समझौते से वैश्विक व्यापार और भारतीय अर्थव्यवस्था को बड़ी राहत मिलने की उम्मीदें बरकरार हैं।

भारत के लिए कूटनीतिक और आर्थिक संजीवनी

अमेरिका और ईरान के बीच यह शांति समझौता भारत के लिए एक बड़ी आर्थिक राहत लेकर आ रहा है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। संघर्ष विराम होने और व्यापारिक मार्ग खुलने से भारतीय बाजारों में इसका बेहद सकारात्मक असर देखने को मिलेगा। इससे देश में चौतरफा महंगाई कम होने के आसार बढ़ गए हैं।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुलने से कच्चे तेल में गिरावट

युद्ध के दौरान ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज मार्ग पर पाबंदियां लगा दी थीं, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति ठप हो गई थी। अब इस समझौते के तहत अमेरिकी नौसेना की नाकेबंदी हटने और होर्मुज जलडमरूमध्य के पूरी तरह खुलने से कच्चे तेल की निर्बाध आपूर्ति शुरू हो गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम गिरने से भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें काफी कम हो सकती हैं।

LPG सिलेंडर की किल्लत होगी दूर, घटेंगे दाम

भारत अपनी घरेलू जरूरत की करीब 88 फीसदी एलपीजी गैस का आयात इसी समुद्री रास्ते के जरिए करता है। अब खाड़ी देशों से आपूर्ति सामान्य होने पर देश में पर्याप्त मात्रा में रसोई गैस उपलब्ध होगी। इससे केंद्र सरकार पर सब्सिडी का वित्तीय बोझ कम होगा। साथ ही आम उपभोक्ताओं को घरेलू और कमर्शियल एलपीजी सिलेंडरों के दामों में बड़ी राहत मिल सकती है।

ट्रांसपोर्टेशन और मैन्युफैक्चरिंग लागत में भारी कमी

डीजल की कीमतें घटने का सीधा असर देश की माल ढुलाई और लॉजिस्टिक्स सेक्टर पर पड़ता है। जब ट्रांसपोर्टेशन की लागत कम होगी, तो एक राज्य से दूसरे राज्य में जाने वाले फल, सब्जियां और अन्य खाद्य सामग्रियां सस्ती हो जाएंगी। इसके अलावा मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में इस्तेमाल होने वाले ईंधन की लागत घटने से फैक्ट्रियों में उत्पादन खर्च भी काफी कम हो जाएगा।

रोजमर्रा के सामान और कॉस्मेटिक्स होंगे सस्ते

कच्चा तेल सस्ता होने से पेट्रोलियम आधारित कच्चे माल जैसे सिंथेटिक धागे और पेट्रोकेमिकल्स के दाम घटेंगे। इसका सीधा असर रोजमर्रा की चीजों पर पड़ेगा। कपड़े धोने का डिटर्जेंट, नहाने का साबुन, प्लास्टिक पैकेजिंग, रैपर और डिब्बे बनाने की लागत कम हो जाएगी। इसके अलावा कोल्ड क्रीम, बॉडी लोशन, लिपस्टिक और काजल जैसे कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स की कीमतों में भी बड़ी गिरावट देखने को मिलेगी।

जूते-चप्पल, रेडीमेड कपड़े और मेडिकल उत्पाद होंगे किफायती

पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में कमी का फायदा गारमेंट और फुटवियर इंडस्ट्री को भी मिलेगा। स्पोर्ट्स वियर, रेडीमेड कपड़े, पर्दे और कालीनों के दाम नीचे आ जाएंगे। साथ ही चिकित्सा क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाली जरूरी दवाइयां, सिरिंज, ग्लूकोज की बोतलें, मेडिकल ट्यूब, दस्ताने और मास्क जैसे कई जरूरी मेडिकल प्रोडक्ट्स भी पहले से काफी किफायती दरों पर मिलने लगेंगे।

किसानों को मिलेगी राहत, कीटनाशक होंगे सस्ते

भारतीय कृषि क्षेत्र के लिए भी यह समझौता बेहद फायदेमंद साबित होने वाला है। डीजल सस्ता होने से किसानों की सिंचाई और जुताई की लागत कम होगी। इसके अलावा खाड़ी देशों से आने वाले फर्टिलाइजर की सप्लाई सुधरेगी। फसलों को कीड़ों और बीमारियों से बचाने के लिए इस्तेमाल होने वाले कई तरह के रासायनिक कीटनाशक और पेस्टिसाइड्स भी काफी सस्ते हो जाएंगे।

हवाई सफर होगा सस्ता, प्लेन टिकट के घटेंगे दाम

विमानन क्षेत्र के लिए कच्चा तेल सबसे बड़ा खर्च होता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आने से एविएशन टर्बाइन फ्यूल यानी एटीएफ के दाम घटेंगे। हवाई ईंधन सस्ता होने से घरेलू और अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंस कंपनियां अपने परिचालन खर्च में कमी का फायदा यात्रियों को देंगी। इसके चलते आने वाले दिनों में हवाई टिकटों के दाम घट सकते हैं।

महंगाई घटने से कम हो सकती है आपके लोन की EMI

कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से देश की कुल खुदरा महंगाई दर नीचे आ जाएगी। जब देश में महंगाई नियंत्रित होगी, तो रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के पास अपनी मुख्य ब्याज दरों यानी रेपो रेट में कटौती करने का मौका होगा। ब्याज दरें घटने से आम जनता को होम लोन, कार लोन और बिजनेस लोन की ईएमआई (EMI) पर बड़ी राहत मिल सकती है।

टायर और ऑटो पार्ट्स इंडस्ट्री को मिलेगा बड़ा बूस्ट

कच्चे तेल पर निर्भर रहने वाली टायर इंडस्ट्री को इस शांति समझौते से सबसे ज्यादा राहत मिलने वाली है। टायर निर्माण में इस्तेमाल होने वाला सिंथेटिक रबर पूरी तरह से पेट्रोलियम आधारित होता है। कच्चे माल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें घटने से टायर निर्माता कंपनियों की उत्पादन लागत में भारी कमी आएगी, जिससे बाजार में नए टायर और ऑटो पार्ट्स सस्ते हो जाएंगे।

Author: Rajesh Kumar

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