New Delhi News: पश्चिम एशिया के युद्ध क्षेत्र से भारत के लिए एक बेहद बड़ी और राहत भरी खबर सामने आई है। सोमवार को भारत आ रहा विशाल एलएनजी वाहक जहाज ‘दिशा’ होर्मुज जलडमरूमध्य के बेहद खतरनाक रास्ते से पूरी तरह सुरक्षित बाहर निकल गया है।
इस बड़े जहाज के सुरक्षित निकलने के बाद फारस की खाड़ी में लंबे समय से फंसे 34 अन्य भारतीय और विदेशी झंडे वाले जहाजों के भी भारतीय बंदरगाहों तक सुरक्षित और तेजी से पहुंचने की उम्मीद बहुत ज्यादा बढ़ गई है। यह राहत ऐसे समय में मिली है जब अमेरिका और ईरान ने ऐतिहासिक शांति समझौते का एलान किया है।
खाड़ी देशों में फंसे इन जहाजों में उर्वरक (फर्टिलाइजर) से लदे 16 जहाजों की संभावित रवानगी से भारत के कृषि क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण पोषक तत्वों की आपूर्ति बढ़ाने में बड़ी मदद मिलेगी। हालांकि, बेहतर ऊर्जा आपूर्ति को लेकर भारतीय नीति निर्माता और विशेषज्ञ अभी भी थोड़े आशंकित दिखाई दे रहे हैं।
विशेषज्ञों को चिंता है कि अमेरिका-ईरान शांति समझौते के बावजूद भारत को ऊर्जा आपूर्ति में तत्काल राहत शायद ही मिल सके। इसकी मुख्य वजह यह है कि कतर के रास लाफान जैसे बड़े गैस केंद्रों और बुनियादी ढांचों को युद्ध के दौरान भारी नुकसान पहुंचा है।
गैस प्लांटों की तबाही से तत्काल राहत मिलना मुश्किल
गैस प्लांट और अन्य औद्योगिक सुविधाओं को हुए व्यापक नुकसान से यह अनिश्चितता पैदा हो गई है कि खाड़ी देशों में सामान्य परिचालन कब शुरू होगा। कतरएनर्जी की रास लाफान सुविधा के साथ भारत का दीर्घकालिक गैस आपूर्ति का एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण अनुबंध है।
इसके अलावा, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के प्रसिद्ध हबशान गैस प्लांट को भी युद्ध में भारी नुकसान पहुंचा है, जिससे वहां का परिचालन पूरी तरह बाधित हुआ है। अधिकारियों ने बताया कि इस प्लांट की करीब 60% क्षमता बहाल कर दी गई है और 2026 के अंत तक 80% रिकवरी की उम्मीद है।
सरकारी अधिकारियों के अनुसार, कतरएनर्जी की रास लाफान सुविधा में दो बड़ी तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) प्रोसेसिंग यूनिट्स पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई हैं। इस तकनीकी नुकसान के कारण प्लांट की लगभग 17% उत्पादन क्षमता पूरी तरह से समाप्त हो गई है।
पश्चिम एशिया पर निर्भर है भारत का ऊर्जा आयात
इस संघर्ष से पहले, भारत अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का 88% से अधिक हिस्सा विदेशों से आयात करता था। इस कुल आयात का लगभग आधा हिस्सा अकेले पश्चिम एशिया से आता था। इसके अलावा भारत की 60% से अधिक आयातित एलएनजी भी इसी होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरती थी।
भारत अपनी एलपीजी आवश्यकताओं का लगभग 60% हिस्सा पश्चिम एशिया से ही प्राप्त करता था, जिसकी लगभग 90% आपूर्ति होर्मुज के रास्ते होती थी। वर्तमान में खाड़ी में फंसे जहाजों में से 15 जहाज कच्चा तेल, एलएनजी और एलपीजी ले जा रहे हैं, जबकि शेष तीन पर अन्य कार्गो लदा है।
जहाजरानी मंत्रालय और उर्वरक विभाग ने दी बड़ी जानकारी
पश्चिम एशिया के हालिया घटनाक्रम पर संवाददाताओं को जानकारी देते हुए, जहाजरानी मंत्रालय के निदेशक ओपेश कुमार शर्मा ने कहा कि एलएनजी वाहक ‘दिशा’ होर्मुज जलडमरूमध्य से सुरक्षित रूप से गुजर गई है। यह जहाज 62,370 टन एलएनजी कार्गो लेकर 18 जून को गुजरात के दाहेज बंदरगाह पहुंचेगा।
वहीं, उर्वरक विभाग की संयुक्त सचिव वंदना प्रेयशी ने बताया कि इस महत्वपूर्ण जलडमरूमध्य में मौजूद कुल 16 उर्वरक जहाजों में से 8 जहाज यूरिया, 4 जहाज डाई-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी), 3 जहाज सल्फर और 1 जहाज अमोनिया लेकर भारतीय बंदरगाहों की तरफ आ रहा है।
Author: Rajesh Kumar


