TATA की इस चालाकी के आगे ढेर हो गई ‘देश की धड़कन’, 90% मार्केट पर राज करने वाली HMT कैसे हुई बर्बाद?

Business News: भारतीय घड़ी बाजार में एक दौर ऐसा भी था, जब सिर्फ एक ही नाम गूंजता था। वह नाम था HMT यानी हिंदुस्तान मशीन टूल्स, जिसे लोग प्यार से ‘देश की धड़कन’ कहते थे। सत्तर और अस्सी के दशक में इस ब्रांड का भारतीय बाजार के करीब 90 फीसदी हिस्से पर एकछत्र राज था।

उस दौर में HMT सिर्फ समय देखने का साधन नहीं थी, बल्कि यह पहनने वाले की सामाजिक हैसियत भी तय करती थी। शादी-ब्याह का मौका हो या कोई बड़ी परीक्षा पास करने की खुशी, उपहार में यह घड़ी देना एक बड़ी परंपरा बन चुकी थी। हर कोई इसे अपनी कलाई पर सजाना चाहता था।

नेहरू युग में शुरू हुआ था स्वदेशी का यह सफर

इस ऐतिहासिक स्वदेशी ब्रांड की नींव भारत सरकार ने साल 1953 में एक पब्लिक सेक्टर कंपनी के रूप में रखी थी। शुरुआती दौर में यह कंपनी सिर्फ भारी मशीन टूल्स बनाने का काम करती थी। इसके बाद साल 1961 में बेंगलुरु में जापान की सिटिजन वॉच कंपनी के साथ मिलकर घड़ी बनाने की शुरुआत हुई।

HMT घड़ियों की पहली खेप को देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने खुद देश के सामने पेश किया था। हाथ से चाबी भरने वाली यह मैकेनिकल घड़ी बेहद मजबूत और आम आदमी के बजट में थी। देखते ही देखते यह ब्रांड नए और आत्मनिर्भर भारत का सबसे बड़ा प्रतीक बन गया।

शादियों का सबसे बड़ा ‘स्टेटस सिंबल’

सत्तर और अस्सी के दशक में इस घड़ी की लोकप्रियता अपने चरम पर पहुंच चुकी थी। तब बेटी की शादी में दामाद को HMT की घड़ी देना सबसे बड़े गर्व की बात मानी जाती थी। साल 1991 तक आते-आते कंपनी ने सालाना 70 लाख घड़ियों का रिकॉर्ड उत्पादन शुरू कर दिया था।

अपने पूरे सुनहरे सफर में इस सरकारी कंपनी ने देश भर में 11 करोड़ से अधिक घड़ियां बेचीं। बाजार में इस ब्रांड की इतनी भारी मांग थी कि लोगों को एक घड़ी खरीदने के लिए हफ्तों पहले बुकिंग करानी पड़ती थी और लंबी कतारों में इंतजार करना पड़ता था।

टाटा की एंट्री और बदल गया पूरा गेम

HMT की इस बादशाहत को पहला बड़ा झटका तब लगा, जब टाटा ग्रुप ने 1984-85 में ‘टाइटन’ ब्रांड के साथ बाजार में कदम रखा। जहां सरकारी कंपनी घड़ी को सिर्फ एक जरूरत मान रही थी, वहीं टाटा ने टाइटन को एक बेहतरीन लाइफस्टाइल और फैशन प्रोडक्ट के रूप में पेश किया।

टाइटन अपने साथ आधुनिक ‘क्वार्ट्ज’ तकनीक लेकर आया था, जिसमें सेल पड़ता था और चाबी भरने का कोई झंझट नहीं था। HMT के पैर तब पूरी तरह उखड़ गए, जब साल 1986 में उसके करीब 350 से ज्यादा अनुभवी इंजीनियर्स ने एक साथ इस्तीफा देकर टाइटन का दामन थाम लिया।

बदलते वक्त के साथ खुद को नहीं ढाल पाई कंपनी

वैश्विक बाजार काफी पहले ही क्वार्ट्ज तकनीक पर शिफ्ट हो चुका था, लेकिन यह सरकारी कंपनी अपनी पुरानी मैकेनिकल घड़ियों के भरोसे ही बैठी रही। जब तक कंपनी ने ‘सोना’ और ‘विजय’ जैसे नए क्वार्ट्ज मॉडल बाजार में उतारे, तब तक बहुत ज्यादा देर हो चुकी थी।

साल 1991 के आर्थिक उदारीकरण ने विदेशी और निजी कंपनियों के लिए भारत के दरवाजे खोल दिए। एक सरकारी उपक्रम होने के कारण HMT में फैसले लेने की रफ्तार बहुत धीमी थी। लालफीताशाही, नए प्रयोगों की कमी और खराब मैनेजमेंट के कारण कंपनी लगातार भारी घाटे के दलदल में धंसती चली गई।

मई 2016 में हमेशा के लिए थम गई धड़कन

साल 1994 के बाद से कंपनी का घाटा सैकड़ों करोड़ रुपये तक पहुंच गया। नए जमाने के उपभोक्ताओं ने इस ब्रांड से पूरी तरह दूरी बना ली थी। अंततः लगातार बढ़ते नुकसान को देखते हुए भारत सरकार ने मई 2016 में HMT के घड़ी डिवीजन को हमेशा के लिए बंद करने का आदेश दे दिया।

इसके साथ ही फैक्ट्रियों पर हमेशा के लिए ताला लग गया और कर्मचारियों को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति यानी वीआरएस दे दिया गया। इस तरह एक शानदार और ऐतिहासिक भारतीय ब्रांड का अंत हो गया। आज यह घड़ियां सिर्फ शौकीनों के पास एक कलेक्टिबल्स के रूप में ही बची हैं।

Author: Rajesh Kumar

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