Chennai News: तमिलनाडु की नवनिर्वाचित सरकार के खिलाफ देश की सर्वोच्च अदालत में एक बड़ी जनहित याचिका दायर की गई है। इस याचिका में मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली सरकार के विश्वास मत में भारी अनियमितताओं के आरोप लगे हैं। इसके बाद राज्य में एक बार फिर बड़ा सियासी संकट गहरा गया है।
मदुरई के रहने वाले केके रमेश ने सुप्रीम कोर्ट में यह जनहित याचिका दाखिल की है। याचिकाकर्ता ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो से कराने की पुरजोर वकालत की है। उन्होंने सीबीआई जांच पूरी होने तक राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की भी मांग की है।
तमिलनाडु विधानसभा में सरकार बनाने के लिए जादुई आंकड़ा 118 विधायकों का है। मुख्यमंत्री जोसेफ विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम ने 13 मई को 144 विधायकों के समर्थन के साथ बहुमत साबित किया था। लेकिन अब इस पूरी प्रक्रिया पर ही गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
याचिका में विधानसभा भंग करने की मांग क्यों की गई
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका के अनुसार टीवीके के पास खुद की केवल 108 सीटें थीं। बहुमत साबित करने के लिए पार्टी ने अन्य गुटों का समर्थन लिया था। आरोप है कि कांग्रेस, वामदलों और अन्नाद्रमुक के बागी विधायकों को पाला बदलने के लिए भारी रकम दी गई थी।
याचिकाकर्ता का दावा है कि कई विधायकों ने पैसे के लालच में अपनी मूल पार्टी के व्हिप का सीधा उल्लंघन किया। फ्लोर टेस्ट में लोकतांत्रिक नियमों की धज्जियां उड़ाई गईं। इसलिए इस अवैध प्रक्रिया के कारण विधानसभा को तुरंत भंग करके स्वतंत्र जांच कराई जानी बेहद जरूरी है।
इस जनहित याचिका में अधिवक्ता नरेंद्र कुमार वर्मा के माध्यम से भारत संघ, सीबीआई और तमिलनाडु सरकार को मुख्य पक्षकार बनाया गया है। रमेश ने कहा कि राज्य का नागरिक होने के नाते लोकतांत्रिक मूल्यों के हनन से उनके मौलिक अधिकारों का सीधा हनन हुआ है।
अन्नाद्रमुक पार्टी में हुई बड़ी बगावत का पूरा सच
याचिका में विश्वास मत के दौरान मुख्य विपक्षी दल अन्नाद्रमुक में हुई ऐतिहासिक फूट का भी विस्तार से ब्यौरा दिया गया है। पार्टी के दिग्गज नेता सी. वी. षणमुगम और एसपी वेलुमणि के नेतृत्व में 25 विधायकों ने पार्टी लाइन से अलग जाकर विजय सरकार के पक्ष में वोट डाला था।
दूसरी तरफ अन्नाद्रमुक के महासचिव एडप्पादी के. पलानीस्वामी के वफादार 22 विधायकों ने सरकार के खिलाफ मतदान किया था। इस घटना के बाद दोनों गुटों ने विधानसभा अध्यक्ष जेसीडी प्रभाकर के पास पहुंचकर एक-दूसरे के विधायकों को अयोग्य ठहराने की कानूनी मांग की है।
संविधान के 91वें संशोधन के तहत अब किसी भी दल में आंतरिक विभाजन को कोई कानूनी संरक्षण नहीं मिलता है। किसी दूसरे दल में विलय के लिए कम से कम दो-तिहाई विधायकों का समर्थन अनिवार्य है। इस कानूनी पेंच के कारण अब विजय सरकार की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
Author: Harikarishan Sharma


