Himachal Pradesh News: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कर्मचारी तबादलों को लेकर एक बेहद ऐतिहासिक और बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी कर्मचारी को स्थानांतरण के खिलाफ याचिका दायर करने से रोकना सीधे न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप माना जाएगा।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि ऐसा दमनकारी कदम उठाना आपराधिक अवमानना की श्रेणी में आता है। अदालत में अपने अधिकारों के लिए याचिका दायर करना भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत देश के हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है।
सरकार की अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी पर फिरा पानी
अदालत की इस नई कानूनी व्याख्या के बाद अब कर्मचारियों को डराना प्रशासनिक अधिकारियों के लिए बेहद भारी पड़ेगा। तबादले के खिलाफ कोर्ट जाने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की धमकी देना अब संबंधित अधिकारियों को सीधे जेल की हवा खिला सकता है।
दरअसल, दो दिन पहले ही राज्य सरकार ने एक नया कड़ा प्रविधान लागू किया था। इसके अनुसार यदि कोई सरकारी कर्मचारी ट्रांसफर के खिलाफ सीधे हाईकोर्ट का रुख करता है, तो विभाग उसके खिलाफ नियमों के तहत बड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू कर देगा।
कार्मिक विभाग ने व्यापक मार्गदर्शक सिद्धांत-2013 (CGP-2013) में संशोधन करके इस नए नियम को जोड़ा था। इसके तहत फरवरी 2025 में एक नया पैरा 22 (अ) शामिल किया गया था, जिसमें विभागीय स्तर पर ही शिकायत निवारण की व्यवस्था तय की गई थी।
हाईकोर्ट के कड़े रुख के आगे बैंक अफसरों को मांगनी पड़ी माफी
सरकार ने सभी कर्मचारियों को निर्देश दिए थे कि वे अदालत जाने से पहले अपनी शिकायत सक्षम प्राधिकारी के सामने प्रस्तुत करें। हालांकि, हाईकोर्ट ने साफ किया कि प्रशासनिक नीतियों के नाम पर किसी भी नागरिक के मौलिक अधिकारों को छीना नहीं जा सकता है।
उल्लेखनीय है कि इसी तरह के एक गंभीर मामले में दो बड़े प्रशासनिक अधिकारियों को हाईकोर्ट से बिना शर्त लिखित माफी मांगनी पड़ी है। इन अधिकारियों ने बैंक की स्थानांतरण नीति के खिलाफ अदालत गए एक कर्मचारी को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया था।
यह पूरा मामला हिमाचल प्रदेश ग्रामीण बैंक से जुड़ा हुआ है। वहां के क्षेत्रीय प्रबंधक ने प्रार्थी से पूछा था कि उसने सीधे कोर्ट में याचिका क्यों दायर की। यह मुख्य मामला अभी अंतिम निर्णय के लिए माननीय हाईकोर्ट के समक्ष विचाराधीन बना हुआ है।
Author: Adv Anuradha Rajput


