महंगाई का डबल अटैक: रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची थोक महंगाई दर, अब खाने-पीने की चीजों पर मंडराया बड़ा संकट!

Business News: भारत में महंगाई एक बार फिर अपने चरम पर पहुंच गई है, जिससे आम जनता का बजट पूरी तरह बिगड़ रहा है। देश की थोक महंगाई दर (WPI) अप्रैल 2026 में बढ़कर 8.3 प्रतिशत पर पहुंच गई है। यह पिछले करीब साढ़े तीन साल का सबसे ऊंचा स्तर है।

दुनिया भर में बढ़ते गंभीर तनाव का सीधा असर भारतीय बाजार पर साफ देखने को मिल रहा है। अमेरिका-ईरान के बीच जारी विवाद, कच्चे तेल की लगातार बढ़ती कीमतें और डॉलर के मुकाबले रुपये की रिकॉर्ड कमजोरी ने मिलकर भारतीय अर्थव्यवस्था पर चौतरफा दबाव काफी ज्यादा बढ़ा दिया है।

बैंक ऑफ बड़ौदा की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, अगर पश्चिम एशिया का यह तनाव लंबे समय तक ऐसे ही बना रहा, तो हालात बेकाबू हो सकते हैं। देश में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतें लंबे समय तक बेहद ऊंचे स्तर पर बनी रह सकती हैं।

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बहुत बड़ा हिस्सा हमेशा विदेशों से ही आयात करता है। यही वजह है कि जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होता है, तो देश में ईंधन की कीमतें आसमान छूने लगती हैं। इसका सीधा असर आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता है।

फ्यूल और पावर कैटेगरी में 42 महीनों का सबसे बड़ा उछाल

अप्रैल के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, सबसे ज्यादा मार फ्यूल और पावर कैटेगरी पर पड़ी है। इस क्षेत्र में महंगाई दर रिकॉर्ड 24.7 प्रतिशत तक पहुंच गई है। विमान ईंधन (ATF) की कीमतों में 100 प्रतिशत से ज्यादा की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो बेहद चिंताजनक है।

इसके साथ ही पेट्रोल, डीजल और मिट्टी का तेल भी काफी ज्यादा महंगा हो गया है। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में 54 प्रतिशत से ज्यादा की आई तूफानी तेजी ही इसकी मुख्य वजह है। इससे परिवहन लागत बढ़ने से हर चीज के दाम बढ़ रहे हैं।

कच्चे माल की बढ़ती लागत से मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर बेहाल

ईंधन के अलावा एल्युमिनियम और कॉपर जैसी औद्योगिक धातुओं की बढ़ती कीमतों ने भी महंगाई को हवा दी है। इससे देश के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर भारी दबाव है। मशीनरी, टेक्सटाइल, केमिकल और दवा उद्योगों में उत्पादन लागत लगातार बढ़ती जा रही है।

विशेषज्ञों को डर है कि यदि मानसून कमजोर रहा, तो खाद्य महंगाई भी बेकाबू हो सकती है। बाजार में सब्जियों, दूध, अंडे और मांस-मछली की कीमतें पहले ही बढ़ने लगी हैं। डॉलर के मुकाबले रुपये के लगातार कमजोर होने से विदेशों से होने वाला आयात और ज्यादा महंगा हो गया है।

Author: Rajesh Kumar

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