World News: अमेरिका और ईरान के बीच हुए नए शांति समझौते को लेकर दुनिया भर के रणनीतिक विश्लेषक लगातार बड़े सवाल उठा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को इस डील से युद्ध रोकने का रास्ता तो मिल गया, लेकिन वाशिंगटन को कोई बड़ी रणनीतिक जीत हासिल नहीं हुई है।
इस सौदे को लेकर खुद अमेरिका के भीतर ही ट्रंप प्रशासन की तीखी आलोचना की जा रही है। अमेरिकी सरकार ने करीब उनतीस बिलियन डॉलर का भारी बजट खर्च करके जिस मुख्य लक्ष्य को पाने के लिए यह विनाशकारी युद्ध शुरू किया था, उसे हासिल करने में वह पूरी तरह नाकाम रही है।
ईरान को तीन सौ बिलियन डॉलर का भारी मुआवजा देगी अमेरिकी सरकार
इस युद्ध की वजह से वाशिंगटन ने ईरान को करीब तीन सौ बिलियन डॉलर से ज्यादा का भारी वित्तीय नुकसान पहुंचाया था। लेकिन अब नए समझौते के तहत तेहरान को इस नुकसान का पूरा मुआवजा लौटाया जा रहा है, जिससे अमेरिकी नागरिकों में गहरा असंतोष देखा जा रहा है।
इसके साथ ही मिडिल ईस्ट क्षेत्र में अमेरिका के सबसे प्रमुख सहयोगी देशों कतर, कुवैत, बहरीन, यूएई और सऊदी अरब को इस जंग के चलते लगभग पांच सौ बिलियन डॉलर का भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा है। अमेरिकी राजनेता इस कूटनीति को वाशिंगटन का आत्मसमर्पण मान रहे हैं।
डेमोक्रेट सांसद ने डील को बताया तेहरान के सामने घुटने टेकना
अमेरिका में ज्यादातर विपक्षी नेता और रक्षा विशेषज्ञ मान रहे हैं कि इस नई पीस डील से अमेरिका के मुकाबले ईरान को बहुत ज्यादा राजनीतिक और आर्थिक फायदा हुआ है। डेमोक्रेट पार्टी के सांसद क्रिस मर्फी ने खुलकर कहा कि यह अंतिम समझौता तेहरान के सामने पूरी तरह सरेंडर जैसा लगता है।
इसके बावजूद अमेरिकी संसद के कई सदस्य इस बात से खुश हैं कि कम से कम युद्ध हमेशा के लिए रुक जाएगा। लेकिन अमेरिका का सबसे करीबी मित्र देश इजरायल इस कूटनीति से बेहद नाराज है। वहां की सत्ताधारी पार्टी और विपक्ष मिलकर इस समझौते का पुरजोर विरोध कर रहे हैं।
इजरायली वायुसेना की शानदार सैन्य सफलताएं हुईं पूरी तरह बेकार
इजरायल की डेमोक्रेट्स पार्टी के प्रमुख याइर गोलान ने इस अंतरराष्ट्रीय समझौते की खुलकर निंदा की है। उन्होंने कहा कि यह सौदा इजरायल के राष्ट्रीय हितों के लिए बेहद खराब है। इजरायली वायुसेना और जांबाज सैनिकों ने जो शानदार सैन्य सफलताएं हासिल की थीं, वे अब बेकार हो गई हैं।
प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने देश की जनता से ईरान के खिलाफ एक निर्णायक जीत का वादा किया था, लेकिन इस डील के बाद तेहरान पहले से कहीं ज्यादा ताकतवर होकर उभरा है। यही वजह है कि वर्तमान इजरायली सरकार के कई वरिष्ठ मंत्रियों ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
इजरायल अमेरिका के अधीन नहीं हम एक आजाद और संप्रभु देश हैं
इजरायल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतमार बेन ग्वीर ने बेहद सख्त लहजे में कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह नया समझौता इजरायल पर बिल्कुल लागू नहीं होता है। उनका देश इस समझौते की किसी भी शर्त का हिस्सा नहीं बनेगा क्योंकि इजरायल, अमेरिका के अधीन कोई गुलाम देश नहीं है।
उन्होंने साफ किया कि इजरायल एक पूरी तरह आजाद और संप्रभु देश है, जो अपनी सुरक्षा प्राथमिकताओं को खुद तय करेगा। दूसरी तरफ ईरान इस डील में अमेरिका से यह लिखित गारंटी मांग रहा है कि इजरायल भविष्य में कभी भी उसके परमाणु ठिकानों पर कोई सैन्य हमला नहीं करेगा।
लेबनान सीमा से पीछे नहीं हटेगी इजरायल की आक्रामक सेना
इजरायल के रक्षा मंत्री इजराइल काट्ज़ ने भी एक बड़ा आधिकारिक ऐलान करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि लेबनान के जिन अग्रिम इलाकों में इजरायली सेना मौजूद है, वह वहां से बिल्कुल पीछे नहीं हटेगी। इजरायल भविष्य में लेबनान पर हवाई हमले रोकेगा, इसकी भी कोई गारंटी नहीं है।
इस आक्रामक रुख के पीछे मुख्य कारण यह है कि इजरायल चाहता था कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को हमेशा के लिए पूरी तरह नष्ट कर दिया जाए। लेकिन इस नए समझौते में इस सबसे बड़े सुरक्षा मुद्दे को अगले साठ दिनों की भविष्य की बातचीत के भरोसे छोड़ दिया गया है।
ईरान के घातक मिसाइल कार्यक्रम को रोकने की कोई स्पष्ट नीति नहीं
इजरायल की मुख्य मांग थी कि ईरान का संवर्धित यूरेनियम भंडार तुरंत देश से बाहर भेजा जाए, लेकिन समझौते में इस पर कोई फैसला नहीं हुआ। इसके साथ ही ईरान के उस खतरनाक मिसाइल कार्यक्रम को रोकने का लक्ष्य भी गायब है, जिसने इजरायल को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया था।
इस डील से हिज्बुल्लाह पर सैन्य दबाव बनाए रखने की इजरायली रणनीति को बहुत बड़ा झटका लगा है, क्योंकि लेबनान को भी इस युद्धविराम में शामिल किया गया है। अमेरिकी प्रतिबंधों में संभावित बड़ी राहत मिलने से तेहरान को आने वाले दिनों में भारी वित्तीय और राजनीतिक लाभ मिल सकता है।
बिना इजरायल की सहमति के लंबे समय तक नहीं टिक पाएगी पीस डील
इजरायल की योजना लेबनान और अन्य मोर्चों पर अपनी सैन्य कार्रवाई की पूरी आजादी बनाए रखने की थी, लेकिन अमेरिकी कूटनीतिक दबाव उसे युद्धविराम की तरफ धकेल रहा है। आगामी उन्नीस जून को इस समझौते पर हस्ताक्षर होने से वैश्विक तेल बाजार को भले ही तुरंत बड़ी राहत मिल जाए।
लेकिन अगर इजरायल इस बड़े अंतरराष्ट्रीय शांति समझौते का आधिकारिक हिस्सा नहीं बनता है, तो पश्चिम एशिया में शांति की उम्मीद बेमानी होगी। जब तक हिज्बुल्लाह का मुद्दा पूरी तरह नहीं सुलझता और ईरान के परमाणु भंडार पर मतभेद बने रहेंगे, तब तक इस डील की उम्र बहुत कम रहेगी।
Author: Pallavi Sharma


