Tehran News: ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन के बाद देश में छह दिनों का राजकीय शोक घोषित किया गया है। इस दौरान पूरी दुनिया की नजरें तेहरान और मश्हाद की गतिविधियों पर टिकी हैं। इसी बीच 101 साल के वरिष्ठ शिया धर्मगुरु ग्रैंड अयातुल्ला होसैन नूरी हमेदानी अचानक सबसे ज्यादा चर्चा में आ गए हैं।
ईरानी प्रशासन ने ग्रैंड अयातुल्ला होसैन नूरी हमेदानी को दिवंगत सुप्रीम लीडर की अंतिम प्रार्थना यानी फ्यूनरल प्रेयर की अगुवाई करने की बेहद महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है। इस बड़े फैसले को राजनीतिक और रणनीतिक नजरिए से भी काफी अहम माना जा रहा है। सरकार इसके जरिए व्यवस्था की स्थिरता का संदेश देना चाहती है।
नेतृत्व परिवर्तन के दौर में स्थिरता का बड़ा कूटनीतिक संदेश
ईरान इस समय एक बड़े और संवेदनशील नेतृत्व परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर सरकार दुनिया को यह कड़ा संदेश देना चाहती है कि देश की धार्मिक और राजनीतिक व्यवस्था पूरी तरह नियंत्रण में है। इसी वजह से दशकों से बेहद प्रभावशाली रहे हमेदानी को सामने लाया गया है।
ग्रैंड अयातुल्ला होसैन नूरी हमेदानी का जन्म साल 1925 में ईरान के ऐतिहासिक शहर हमदान में हुआ था। वह शिया इस्लाम के सबसे सर्वोच्च धार्मिक पद ‘मर्जा अल-तकलीद’ पर आसीन हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि ईरान के बाहर भी दुनिया भर के लाखों शिया मुसलमान उनके फैसलों का पालन करते हैं।
1979 की इस्लामिक क्रांति से रहा है गहरा नाता
धर्मगुरु हमेदानी का नाम साल 1979 की ऐतिहासिक इस्लामिक क्रांति से भी बहुत गहराई से जुड़ा रहा है। उस दौर में वे अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी के सबसे भरोसेमंद और खास सहयोगियों में शामिल थे। शाह के शासन के खिलाफ मुखर आवाज उठाने के कारण उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा था।
शाह के तानाशाही शासन के दौरान उन्होंने लंबे समय तक निर्वासन का दर्द भी झेला था। ईरान के इस्लामिक गणराज्य बनने के बाद उन्होंने नई शासन व्यवस्था को धार्मिक और कानूनी वैधता दिलाने में सबसे अग्रिम भूमिका निभाई थी। वे हमेशा व्यवस्था के मजबूत स्तंभ के रूप में डटे रहे।
दिवंगत सुप्रीम लीडर के सबसे बड़े वैचारिक समर्थकों में शुमार
जब अयातुल्ला अली खामेनेई देश के सुप्रीम लीडर बने, तब भी हमेदानी उनके सबसे मजबूत वैचारिक समर्थकों में हमेशा शामिल रहे। उन्होंने सरकार के कई विवादित फैसलों और नीतियों का धार्मिक आधार पर खुलकर समर्थन किया था। अब खामेनेई के बाद ईरानी नेतृत्व परंपरा के मुताबिक सत्ता हस्तांतरण दिखाना चाहता है।
अंतिम प्रार्थना के लिए मश्हाद शहर का चयन भी एक विशेष और सोची-समझी रणनीति के तहत किया गया है। यह पवित्र शहर खामेनेई की जन्मस्थली होने के साथ-साथ ईरान का सबसे बड़ा धार्मिक केंद्र भी है। यहां आठवें शिया इमाम, इमाम अली अल-रिदा की विश्व प्रसिद्ध पवित्र दरगाह मौजूद है।
इजरायल से बढ़ते तनाव के बीच ईरान की खास रणनीति
शिया धार्मिक परंपरा के अनुसार, किसी बड़े धर्मगुरु की अंतिम प्रार्थना हमेशा सबसे वरिष्ठ जीवित धर्मगुरु ही संपन्न कराते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि हमेदानी को आगे रखना एक बड़ा कूटनीतिक कदम है। इजरायल के साथ बढ़ते सैन्य तनाव और पश्चिमी देशों के भारी दबाव के बीच ईरान मजबूती दिखाना चाहता है।
इस बड़े धार्मिक आयोजन के जरिए देश के भीतर किसी भी तरह की अस्थिरता या भ्रम की स्थिति को रोकने का प्रयास किया जा रहा है। नए सुप्रीम लीडर के नाम को लेकर चल रही तमाम अटकलों के बीच ग्रैंड अयातुल्ला होसैन नूरी हमेदानी की सक्रिय मौजूदगी देश के लिए संतुलन का प्रतीक बनी हुई है।

