Chamoli News: देश-दुनिया के प्रकृति प्रेमियों और पर्यटकों के लिए एक बेहद शानदार खबर आई है। उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित विश्व प्रसिद्ध धरोहर ‘फूलों की घाटी’ का मुख्य प्रवेश द्वार आज सोमवार सुबह आठ बजे से पर्यटकों के लिए पूरी तरह खोल दिया गया है।
चमोली जिले में समुद्रतल से 12,995 फीट की भारी ऊंचाई पर फैली यह घाटी लगभग 87.5 वर्ग किलोमीटर के बड़े क्षेत्र में स्थित है। यह सुरम्य घाटी हर साल एक जून से लेकर इकतीस अक्टूबर तक देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के लिए खुली रहती है।
घाटी के बेस कैंप घांघरिया में यात्रा की शुरुआत के लिए ऑफलाइन पंजीकरण की व्यवस्था सुचारू रूप से शुरू कर दी गई है। रविवार देर शाम तक ही बीस से अधिक उत्साही पर्यटकों का पहला दल इस खूबसूरत घाटी के बेस कैंप पहुंच चुका था।
हर 15 दिन में रंग बदलती है यह घाटी
इस घाटी की सबसे बड़ी और जादुई विशेषता यह है कि यहां हर पंद्रह दिनों के अंतराल में अलग-अलग प्रजातियों के नए फूल खिलते हैं। फूलों के इस चक्र के कारण ऐसा अनोखा नजारा प्रतीत होता है, मानो पूरी घाटी समय-समय पर अपना रंग बदल रही हो।

शुरुआत में घाटी की सैर के दौरान पर्यटकों को लेगी नाले में विशाल हिमखंड देखने को मिलेगा। इसके साथ ही सैलानियों को बीस से अधिक विभिन्न प्रजातियों के दुर्लभ और रंग-बिरंगे फूलों का दीदार करने का एक शानदार अवसर भी प्राप्त होगा।
यह घाटी जैवविविधता का एक अद्भुत और समृद्ध खजाना है। यहां पांच सौ से अधिक प्रजाति के बहुरंगी फूलों के साथ-साथ कई दुर्लभ वन्य जीवों का प्राकृतिक आवास भी है। सैलानियों को यहां हिमालयन थार, कस्तूरा मृग और हिम तेंदुआ जैसे वन्य जीव दिख सकते हैं।
इन दुर्लभ फूलों की खूबसूरती बिखरी
घाटी में इस समय पर्यटकों को मुख्य रूप से प्रिमुला डेंटिकुलाटा, पोटेंटिला एट्रो सेंगुइनिया, रोडोडेंड्रोन कैम्पैन्युलेटम, रोडोडेंड्रोन लेपिडोटम, थाइमस यानी वन आजवाइन और कोबरा लिली जैसे खूबसूरत फूल देखने को मिलेंगे। इसके अलावा स्नेक लिली, कोरिडालिस काश्मीरियाना और आइरिस कुमाऊंनेनसिस भी खिले हुए हैं।

साथ ही एलियम ह्यूमाइल, फ्रिटिलेरिया रायली, वायोला बाइफ्लोरा, जैस्मिनम ह्यूमाइल, मार्श मैरीगोल्ड, सिरिंगा इमोडी, थर्मोप्सिस बारबाटा, लिलियम आक्सीपेटलम, एनीमोन रतनजोत और अर्नेबिया बेंथमी जैसे दुर्लभ फूल भी घाटी की सुंदरता में चार चांद लगा रहे हैं। घाटी के बीच से बहती साफ पुष्पावती नदी पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देती है।
कठिन है सफर, शाम तक लौटना अनिवार्य
फूलों की घाटी तक पहुंचने के लिए पर्यटकों को सबसे पहले बदरीनाथ हाईवे पर स्थित ज्योतिर्मठ के पुलना गांव तक पहुंचना पड़ता है। इसके बाद पुलना से बेस कैंप घांघरिया तक दस किलोमीटर का एक बेहद खूबसूरत और कठिन पैदल सफर शुरू होता है।
घांघरिया बेस कैंप से मुख्य फूलों की घाटी का फासला करीब तीन किलोमीटर का है। घाटी के भीतर किसी भी पर्यटक को रात में रुकने की कानूनी अनुमति नहीं है। इस सख्त नियम के कारण सभी पर्यटकों को शाम पांच बजे तक हर हाल में घांघरिया लौटना पड़ता है।
नियमों के मुताबिक पर्यटकों को फूलों की घाटी के भीतर सिर्फ पांच किलोमीटर के तय क्षेत्र तक ही जाने की इजाजत दी जाती है। घाटी के भीतर कोई दुकान न होने के कारण सैलानियों को अपने खाने-पीने का सामान और जरूरी दवाइयां खुद साथ ले जानी पड़ती हैं।

रास्ता भटककर फ्रैंक स्माइथ ने की थी खोज
इस अद्भुत घाटी को साल 1982 में राष्ट्रीय पार्क का दर्जा दिया गया था, जबकि साल 2005 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर घोषित किया। इस अनाम घाटी की खोज साल 1931 में कामेट पर्वत पर चढ़ाई करने गए ब्रिटिश पर्वतारोही और वनस्पति शास्त्री फ्रैंक स्माइथ ने की थी।
वह कामेट पर्वत से लौटते समय अचानक रास्ता भटककर इस अनजान घाटी में प्रवेश कर गए थे। यहां के फूलों के अद्भुत बहुरंगी संसार को देखकर वह इस कदर मोहित हुए कि साल 1937 में दोबारा आए और 1938 में ‘वैली ऑफ फ्लावर’ पुस्तक लिखकर इसे दुनिया के सामने लाए।
घाटी की सैर के लिए निर्धारित शुल्क
नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क प्रशासन ने यात्रा को सुरक्षित और सुगम बनाने के लिए सभी जरूरी इंतजाम पूरे कर लिए हैं। घाटी में वन कर्मियों की विशेष तैनाती की गई है। उप वन संरक्षक अभिमन्यु के अनुसार घांघरिया में पंजीकरण कार्यालय पूरी तरह क्रियाशील हो चुका है।
घाटी में प्रवेश के लिए प्रशासन द्वारा एक निश्चित शुल्क भी तय किया गया है। इसके तहत भारतीय पर्यटकों के लिए 200 रुपये, भारतीय छात्रों और साठ वर्ष से अधिक आयु के बुजुर्गों के लिए 100 रुपये, जबकि विदेशी पर्यटकों के लिए 800 रुपये प्रति व्यक्ति एंट्री फीस निर्धारित की गई है।
Author: Harish Rawat

