Himachal News: हिमाचल प्रदेश में प्रशासन की भारी लापरवाही का एक बड़ा मामला सामने आया है। राज्य में सत्ता परिवर्तन को तीन साल से अधिक का समय बीत चुका है। इसके बावजूद हिमाचल कला संस्कृति एवं भाषा अकादमी की वेबसाइट को अपडेट नहीं किया गया है। वेबसाइट पर आज भी जयराम ठाकुर ही प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में नजर आ रहे हैं। यह स्थिति प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली और सरकारी कामकाज की गंभीरता पर कई बड़े सवाल खड़े करती है।
वेबसाइट पर पुराने मंत्रियों और अधिकारियों का कब्जा
अकादमी की वेबसाइट पूरी तरह से पुरानी जानकारी दिखा रही है। मुख्य पृष्ठ पर पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर का पुराना संदेश आज भी मौजूद है। इसके साथ ही पूर्व भाजपा सरकार में शिक्षा मंत्री रहे गोविंद सिंह ठाकुर का नाम भी बतौर मंत्री दर्ज है। वेबसाइट की जानकारी के अनुसार डॉ. कर्म सिंह अभी भी अकादमी के सचिव हैं। सरकार बदलने के इतने लंबे समय बाद भी आधिकारिक पोर्टल पर पुरानी जानकारी होना एक बड़ी प्रशासनिक चूक मानी जा रही है।
फरवरी 2021 के बाद से पोर्टल पर कोई नई जानकारी नहीं
संस्था की वेबसाइट पर पिछले कई सालों से कोई नया अपडेट नहीं हुआ है। पोर्टल पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार अंतिम सूचना फरवरी 2021 में डाली गई थी। यह जानकारी टांकरी लिपि की एक कार्यशाला से संबंधित है। इसके बाद से वेबसाइट को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया है। स्वायत्त संस्था होने के बावजूद इसका डिजिटल कामकाज पूरी तरह ठप पड़ा है। यह संस्था प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देने के उद्देश्य से ही बनाई गई थी।
प्रसिद्ध लेखक एस आर हरनोट ने सोशल मीडिया पर जताई चिंता
हिमाचल प्रदेश के प्रसिद्ध लेखक एस आर हरनोट ने इस गंभीर मुद्दे को उठाया है। उन्होंने अपने फेसबुक अकाउंट पर वेबसाइट की स्थिति को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। हरनोट ने अकादमी की वेबसाइट के स्क्रीनशॉट भी लोगों के साथ साझा किए हैं। उन्होंने अपनी पोस्ट के माध्यम से अकादमी की सामान्य परिषद के सदस्यों का ध्यान इस ओर खींचा है। उन्होंने तंज कसते हुए सभी सदस्यों को वेबसाइट की जमीनी हकीकत से तुरंत अवगत कराने का प्रयास किया है।
पहाड़ी संस्कृति के संरक्षण के लिए 1972 में हुई थी स्थापना
हिमाचल कला संस्कृति एवं भाषा अकादमी की स्थापना वर्ष 1972 में की गई थी। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य राज्य की समृद्ध कला और साहित्य का संरक्षण करना है। यह अकादमी पहाड़ी बोलियों और अन्य भाषाओं को बढ़ावा देने का निरंतर प्रयास करती है। इनमें मुख्य रूप से हिंदी, संस्कृत और उर्दू भाषा शामिल हैं। इसके अलावा यह संस्था लोक नृत्य और संगीत के क्षेत्र में काम करने वाले स्थानीय कलाकारों को भी प्रोत्साहित करने का काम करती है।
कलाकारों और लेखकों को प्रोत्साहित करने की बड़ी जिम्मेदारी
इस संस्था पर राज्य के पारंपरिक लोक नृत्यों का दस्तावेजीकरण करने का जिम्मा है। अकादमी प्रदेश में नई प्रतिभाओं और लेखकों को आगे बढ़ने के अवसर प्रदान करती है। संस्था द्वारा संस्कृति और साहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वालों को पुरस्कार दिए जाते हैं। मंडेली, कुल्लवी और कांगड़ी जैसी स्थानीय बोलियों के संरक्षण में भी इसकी भूमिका अहम है। लेकिन डिजिटल मोर्चे पर यह महत्वपूर्ण संस्था वर्तमान में पूरी तरह से भारी प्रशासनिक अनदेखी का शिकार हो चुकी है।
डिजिटल युग में संस्कृति के प्रचार-प्रसार पर मंडराता संकट
आज के डिजिटल युग में किसी भी संस्था की वेबसाइट उसकी असली पहचान होती है। हिमाचल प्रदेश की संस्कृति को विश्व स्तर पर पहुंचाने के लिए इस पोर्टल की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। सालों से अपडेट न होने के कारण शोधकर्ताओं और लोगों को सही जानकारी नहीं मिल पा रही है। प्रशासन की यह भारी उदासीनता राज्य की समृद्ध विरासत के प्रचार-प्रसार में बाधा बन रही है। संबंधित सरकारी विभाग को इस तकनीकी और प्रशासनिक लापरवाही पर तुरंत संज्ञान लेना चाहिए।


