Business News: वैश्विक कच्चे तेल बाजार इस समय भारी किल्लत का सामना कर रहा है। तेल की मांग बहुत अधिक है, लेकिन आपूर्ति काफी कम है। देश और रिफाइनरियां कच्चे तेल की खरीद के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं। आपूर्ति कम होने से बाजार की स्थिति लगातार चुनौतीपूर्ण होती जा रही है। असली और वायदा बाजार की कीमतों में बड़ा अंतर सामने आया है। इस संकट का सीधा असर दुनिया भर के व्यापार पर पड़ रहा है।
नॉर्थ सी मार्केट ने दिखाया गहराता संकट
नॉर्थ सी मार्केट ने पिछले हफ्ते कच्चे तेल का संकट स्पष्ट रूप से दिखाया। यहां 40 खरीदारों ने कच्चे तेल के लिए अपनी बोली लगाई। इसके मुकाबले बाजार में केवल चार ही ऑफर सामने आए। मांग अधिक और आपूर्ति कम होने से कीमतें 140 डॉलर के पार पहुंच गईं। दूसरी ओर वायदा बाजार ने ब्रेंट क्रूड को लगभग 95 डॉलर तक गिरा दिया। यह असली और कागजी बाजार के बीच का एक बहुत बड़ा अंतर है।
पश्चिम एशिया और होर्मुज जलडमरूमध्य का प्रभाव
कच्चे तेल के इस संकट का मुख्य कारण पश्चिम एशिया का तनाव है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया का एक बहुत महत्वपूर्ण तेल मार्ग है। तनाव ने इस मार्ग से होने वाली तेल आपूर्ति को काफी प्रभावित किया है। इस रुकावट ने वैश्विक बाजार में 40 दिनों का आपूर्ति गैप बना दिया है। रिफाइनरियां अब केवल पहले निकली हुई खेप ही प्राप्त कर पा रही हैं। इसके बाद बाजार कच्चे तेल की कमी का स्पष्ट रूप से सामना कर रहा है।
रिफाइनरियों के उत्पादन पर पड़ रहा सीधा असर
कच्चे तेल की कमी और बढ़ती कीमतों ने रिफाइनरियों पर सीधा असर डाला है। यूरोप और एशिया की कई रिफाइनरियां अब अपना उत्पादन घटाने पर विचार कर रही हैं। महंगा कच्चा तेल खरीदकर पेट्रोलियम उत्पाद बनाना अब आर्थिक रूप से कठिन हो गया है। उत्पादन में यह कटौती आने वाले समय में बाजार की परेशानी बढ़ाएगी। बाजार जल्द ही डीजल और जेट फ्यूल की भारी कमी का सामना कर सकता है।
वैश्विक व्यापार में बदलाव और प्रीमियम दरें
इस वैश्विक किल्लत ने तेल व्यापार की पूरी दिशा को बदल दिया है। जापान अब अमेरिका से रिकॉर्ड स्तर पर कच्चा तेल खरीद रहा है। इसी तरह चीन ने भी कनाडा से तेल खरीदना शुरू कर दिया है। सभी देश जल्द से जल्द कच्चा तेल प्राप्त करना चाहते हैं। खरीदार तेल के उद्गम स्थल की परवाह बिल्कुल नहीं कर रहे हैं। वे जल्दी तेल पाने के लिए 25 डॉलर तक अतिरिक्त प्रीमियम दे रहे हैं।
वायदा बाजार और भौतिक बाजार का बढ़ता अंतर
कागजी बाजार और भौतिक तेल की मात्रा में एक बड़ा अंतर दिख रहा है। विशेषज्ञ इस स्थिति को बाजार के लिए एक बड़ी विसंगति मान रहे हैं। बाजार में भौतिक रूप से तेल काफी मुश्किल से मिल रहा है। वहीं फ्यूचर्स मार्केट स्थिति को बिल्कुल सामान्य दिखाने का प्रयास कर रहा है। यह गैप दर्शाता है कि आपूर्ति और मांग का संतुलन आगे बिगड़ सकता है। यह असमानता निवेशकों और रिफाइनरियों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है।
भारत ने बदली रणनीति और वेनेजुएला का रुख किया
इस वैश्विक अफरा-तफरी के बीच भारत ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। भारतीय रिफाइनरियों ने वेनेजुएला जैसे दूर के देशों से तेल खरीद बढ़ाई है। कंपनियों ने अप्रैल के पहले हफ्ते में 60 लाख बैरल तेल लोड किया। यह आंकड़ा मार्च महीने की तुलना में लगभग दोगुना है। भारत का यह कदम साबित करता है कि वह कीमत पर निर्भर नहीं है। भारत अब अपनी तेल आपूर्ति सुरक्षा पर पूरा ध्यान केंद्रित कर रहा है।
भविष्य की चुनौतियां और ऊर्जा सुरक्षा की जरूरत
तेल बाजार का यह संकट ऊर्जा सुरक्षा की बड़ी आवश्यकता को उजागर करता है। पश्चिमी देशों की नीतियों और भू-राजनीतिक तनावों ने आपूर्ति श्रृंखला को कमजोर किया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि स्थिति जल्द सामान्य होने की संभावना काफी कम है। देशों को अब ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों पर भी गंभीरता से विचार करना होगा। स्थायी समाधान न निकलने तक बाजार इसी तरह भारी अस्थिरता का सामना करता रहेगा। विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाएं इसका सबसे अधिक नकारात्मक प्रभाव झेलेंगी।


