Himachal Pradesh News: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने आम नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करते हुए दो बेहद महत्वपूर्ण फैसले सुनाए हैं। अदालत ने साफ किया है कि अंतिम आदेश के बिना किसी का पानी काटना कानूनन गलत है। न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ की एकल पीठ ने जल शक्ति विभाग की कार्यप्रणाली पर कड़ी फटकार लगाई। इसके साथ ही एक अन्य मामले में अदालत ने बिना ठोस सबूत फार्मा कंपनी के हिस्सेदारों पर आपराधिक केस चलाने को गलत माना है।
अवैध निर्माण के आरोप पर बिना अंतिम आदेश पानी काटना पूरी तरह अवैध
यह पहला मामला कांगड़ा जिले के देहरा तहसील का है। यहां नगर परिषद देहरा ने याचिकाकर्ता रीमा देवी को अवैध निर्माण के आरोप में एक शुरुआती नोटिस जारी किया था। नगर परिषद ने उन्हें अपना पक्ष रखने के लिए पंद्रह दिनों का समय दिया था। याचिकाकर्ता ने तय समय के भीतर अपना जवाब भी दाखिल कर दिया था। लेकिन इसी बीच जल शक्ति विभाग ने स्वतः संज्ञान लेते हुए याचिकाकर्ता का पानी काटने का तुगलकी नोटिस थमा दिया।
हाईकोर्ट ने इस मामले में दखल देते हुए जल शक्ति विभाग के चार मई के नोटिस को पूरी तरह रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि जब मुख्य मामला अभी विचाराधीन है, तो विभाग पानी जैसी मूलभूत सुविधा को अचानक कैसे काट सकता है। यह कदम प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन है। नगर परिषद ने भी विभाग को ऐसा कोई आदेश नहीं दिया था। अदालत ने अफसरों को कानून के दायरे में काम करने की सख्त हिदायत दी है।
फार्मा कंपनी के केवल पार्टनर होने पर नहीं चलेगा आपराधिक मुकदमा
दूसरी तरफ न्यायाधीश संदीप शर्मा की अदालत ने दवाओं की गुणवत्ता से जुड़े एक मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने नालागढ़ की मैसर्स सालूस फार्मास्युटिकल्स और उसके पार्टनर्स के खिलाफ दर्ज आपराधिक शिकायत को पूरी तरह खारिज कर दिया है। अदालत ने माना कि बिना स्पष्ट भूमिका तय किए कंपनी के हर छोटे-बड़े पार्टनर को आपराधिक मामले में घसीटना कानून की तय प्रक्रिया का सरासर दुरुपयोग है। इससे व्यापारिक माहौल खराब होता है।
उल्लेखनीय है कि अगस्त 2019 में केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन ने जालंधर के मिलिट्री अस्पताल से दवाओं के कुछ सैंपल लिए थे। जांच में ये दवाएं तय मानकों के अनुरूप नहीं पाई गईं। मामला सोलन जिले के बद्दी स्थित फार्मा कंपनी तक पहुंचा। इसके बाद केंद्रीय ड्रग्स इंस्पेक्टर की शिकायत पर नालागढ़ कोर्ट ने मार्च 2022 में पार्टनर्स को समन जारी किए थे। कंपनी ने इसी समन आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
अदालत ने कहा कि ड्रग्स एक्ट की धारा 34 के तहत केवल वही व्यक्ति जिम्मेदार हैं, जो अपराध के समय सीधे तौर पर मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े थे। शिकायत में इस बात का कोई ठोस जिक्र नहीं था कि पार्टनर्स निर्माण प्रक्रिया में शामिल थे। फर्म ने पहले ही तकनीकी विशेषज्ञों के नाम लाइसेंसिंग अथॉरिटी को सौंप रखे थे। याचिकाकर्ताओं के वकील ने भी दलील दी कि कार्रवाई का अधिकार केवल राज्य के ड्रग्स इंस्पेक्टर को है।

