सम्राट चौधरी ही क्यों? बिहार की सियासी पिच पर नीतीश के उत्तराधिकारी बनने की इनसाइड स्टोरी

Bihar News: बिहार की सत्ता के गलियारे में इस बात की चर्चा काफी समय से थी कि नीतीश कुमार के बाद बागडोर किसके हाथ में होगी। आज सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री के रूप में उभरना महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि एनडीए के रणनीतिकारों की बरसों पुरानी स्क्रिप्ट का हिस्सा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने बहुत पहले ही भांप लिया था कि बिहार में मध्य प्रदेश या राजस्थान जैसा कोई चौंकाने वाला प्रयोग सफल नहीं होगा। यहां की जमीन पर केवल वही नाम चल सकता था, जिसकी जड़ें लव-कुश समीकरण में गहराई तक जमी हों।

दो दशक पुराने लव-कुश समीकरण पर फिर भरोसा

साल 1990 के दशक से लालू प्रसाद यादव के वर्चस्व को चुनौती देने के लिए जो सामाजिक ताना-बाना बुना गया, उसका केंद्र ‘लव-कुश’ (कुर्मी-कोययरी) वोट बैंक ही रहा है। भाजपा के रणनीतिकारों ने यह महसूस किया कि राजद के कोर यादव वोट बैंक में सेंध लगाना फिलहाल कठिन है। पूर्व में नित्यानंद राय के जरिए यादव मतों को साधने की कोशिशें बहुत सफल नहीं रही थीं। ऐसे में भाजपा ने अपने पुराने और भरोसेमंद वोट आधार के साथ नीतीश कुमार के लव-कुश आधार को जोड़ने के लिए सम्राट चौधरी को साल 2018 में पार्टी का हिस्सा बनाया था।

सीढ़ी दर सीढ़ी सम्राट का बढ़ता सियासी कद

सम्राट चौधरी को नेतृत्व तक पहुँचाने की प्रक्रिया बहुत व्यवस्थित और चरणबद्ध रही है। 2019 में प्रदेश उपाध्यक्ष से लेकर 2024 में उपमुख्यमंत्री और अब मुख्यमंत्री पद तक का सफर उनकी प्रशासनिक और राजनीतिक परिपक्वता को दर्शाता है। भाजपा ने उन्हें हर मोर्चे पर परखा, चाहे वह विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका हो या प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी। जब नीतीश कुमार ने अपनी ‘समृद्धि यात्रा’ के दौरान सार्वजनिक मंचों पर सम्राट के कंधे पर हाथ रखा, तभी यह साफ हो गया था कि भविष्य का संकेत किस ओर है।

अतिपिछड़ा और दलित मतों का अभेद्य किला

बिहार में सत्ता की चाबी 35 प्रतिशत अतिपिछड़ा और 17 प्रतिशत दलित वोट बैंक के पास है। भाजपा को पता था कि नीतीश कुमार की उम्र और स्वास्थ्य को देखते हुए एक ऐसे चेहरे की जरूरत है, जो पीएम मोदी के प्रभाव को जमीन पर वोट में बदल सके। सम्राट चौधरी इस रेस में सबसे आगे थे क्योंकि उनके नाम पर चिराग पासवान और जीतन राम मांझी जैसे सहयोगियों को भी आपत्ति नहीं थी। पार्टी के अंदरूनी विरोध को दबाने के लिए अमित शाह और पीएम मोदी ने विजय सिन्हा से ही उनका प्रस्ताव दिलवाकर एकता का संदेश दिया।

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