Haridwar News: महान ऋषि पतंजलि ने योग को ‘चित्त वृत्ति निरोध’ के रूप में परिभाषित किया है। इसका सरल अर्थ है कि मन की चंचलता को पूरी तरह शांत करना ही योग है। जब व्यक्ति अपने मन की गतिविधियों को रोक लेता है, तब वह वास्तविक योग की परम स्थिति में प्रवेश करता है।
हम जीवनभर भौतिक उपलब्धियों के पीछे भागते रहते हैं। लेकिन, मन की हलचल से परे जाना ही संसार की सबसे बड़ी उपलब्धि है। यह प्रक्रिया इंसान को हर तरह के मानसिक बंधनों से पूरी तरह मुक्त करती है। मन शांत होते ही मनुष्य ब्रह्मांड की परम संभावना बन जाता है।
स्मृति और कल्पना का मायाजाल
सामान्य तौर पर इंसान का मन केवल अतीत की यादों और भविष्य की कल्पनाओं के बीच ही भटकता रहता है। स्मृति बीते हुए कल का संग्रह है। वहीं कल्पना उसी का बढ़ा-चढ़ाकर देखा गया रूप है। जब मस्तिष्क इन दोनों विकृतियों से मुक्त होता है, तब वह बेहद पैना बन जाता है।
जीवन चलाने के लिए यादें और कल्पनाएं जरूरी हैं। लेकिन, जीवन के रहस्य और दूसरे आयामों को खोजने के लिए यह पर्याप्त नहीं हैं। अतीत को बार-बार दोहराने से जीवन एक सीमित दायरे में बंध जाता है। इस मानसिक पैटर्न से बाहर निकलना ही आत्मज्ञान की पहली सीढ़ी माना जाता है।
पतंजलि: आधुनिक योग के जनक
महर्षि पतंजलि ने योग का आविष्कार नहीं किया था। बल्कि, उन्होंने बिखरे हुए योग विज्ञान को सूत्रों के रूप में पिरोया। इसीलिए उन्हें आधुनिक योग का जनक कहा जाता है। लगभग 200 सूत्रों का यह ढांचा इंसानी जीवन को गहराई से समझने का सबसे प्रभावी दस्तावेज माना जाता है।
योग सूत्र को दुनिया की सबसे महान और गूढ़ कृति माना जाता है। पतंजलि ने इसे किसी दर्शन या साहित्य की तरह नहीं लिखा। उन्होंने जीवन को बदलने वाले छोटे सूत्र दिए हैं। यदि कोई व्यक्ति इसके केवल एक सूत्र को भी जीवन में उतार ले, तो उसका पूरा जीवन बदल जाता है।
अद्भुत है पहला योग सूत्र
पतंजलि योग सूत्र की शुरुआत एक विचित्र वाक्य “…और अब, योग” से होती है। इसका गहरा आध्यात्मिक अर्थ है। यदि आपको लगता है कि धन, संपत्ति या सांसारिक सुखों से जीवन पूर्ण हो जाएगा, तो अभी आपके लिए योग का सही समय बिल्कुल नहीं आया है।
जब आप संसार के सभी सुख-साधन और वैभव देख चुके हों, और फिर भी भीतर से खालीपन महसूस करें, तब योग की शुरुआत होती है। जब अज्ञानता का अंधेरा आपको बेचैन करने लगे, तब समझें कि अब योग के माध्यम से स्वयं को जानने का असली मार्ग खुल गया है।
Author: Pandit Balkrishan Sharma


