महाराष्ट्र में ‘मराठी’ पर रार: मंत्री प्रताप सरनाइक ने राज ठाकरे को घेरा, पूछा- हिंदी भाषियों पर स्टैंड क्या है?

Maharashtra News: महाराष्ट्र की राजनीति में भाषाई अस्मिता का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। राज्य के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाइक ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे के रुख पर गंभीर सवाल उठाए हैं। सरनाइक ने शुक्रवार को कहा कि राज ठाकरे को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वे हिंदी भाषी लोगों को मराठी सिखाने के पक्ष में हैं या नहीं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि ठाकरे का स्टैंड हर दिन बदलता रहता है, जिससे जनता और राजनीतिक हलकों में भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है।

मनसे की विरोधाभासी राजनीति पर तीखा प्रहार

परिवहन मंत्री ने मनसे कार्यकर्ताओं की कार्यप्रणाली पर उंगली उठाई है। उन्होंने बताया कि एक तरफ मनसे कार्यकर्ता कई जगहों पर हिंदी भाषियों के लिए मराठी सिखाने वाली कक्षाएं चला रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ राज ठाकरे स्वयं उत्तर भारतीयों को मराठी सिखाने के उद्देश्य पर सवाल खड़े कर रहे हैं। एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना के मंत्री सरनाइक ने मांग की कि राज ठाकरे अपना नजरिया साफ करें। उनके अनुसार, स्पष्टता होने पर ही मराठी भाषा को वैश्विक स्तर पर प्रभावी ढंग से प्रचारित किया जा सकेगा।

पुणे में राज ठाकरे के बयान से भड़की चिंगारी

विवाद की जड़ गुरुवार को पुणे में राज ठाकरे द्वारा दिया गया वह बयान है, जिसमें उन्होंने उत्तर भारतीयों को मराठी सिखाने की आवश्यकता पर प्रश्नचिह्न लगाया था। ठाकरे ने मनसे के ही कुछ अभियानों के विपरीत जाकर यह टिप्पणी की थी। इसी विरोधाभास को पकड़ते हुए प्रताप सरनाइक ने उन पर हमला बोला। सरनाइक ने कहा कि यदि हम अपनी मातृभाषा का सम्मान और विस्तार चाहते हैं, तो नेतृत्व के विचारों में निरंतरता होनी चाहिए। इस बयानबाजी ने राज्य के राजनीतिक तापमान को बढ़ा दिया है।

ऑटो-टैक्सी चालकों के लिए मराठी बोलना हुआ अनिवार्य

महाराष्ट्र में भाषा का मुद्दा परिवहन मंत्रालय के एक नए निर्देश के बाद दोबारा चर्चा के केंद्र में आया है। मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि राज्य में टैक्सी और ऑटो रिक्शा चालकों को बुनियादी मराठी बोलना आना चाहिए। इस नियम का उद्देश्य स्थानीय यात्रियों और चालकों के बीच संचार को सुगम बनाना है। हालांकि, इस फैसले को लेकर राजनीतिक गलियारों में श्रेय लेने की होड़ मची है। सरनाइक का मानना है कि नियम का पालन सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिकता है, लेकिन विपक्षी दलों को इस पर राजनीति नहीं करनी चाहिए।

भाषाई अस्मिता और आगामी राजनीतिक समीकरण

महाराष्ट्र में मराठी भाषा हमेशा से ही एक संवेदनशील और चुनावी मुद्दा रही है। राज ठाकरे की पार्टी मनसे अपनी स्थापना के समय से ही ‘मराठी मानुष’ के एजेंडे पर चलती रही है। अब सत्ताधारी दल के मंत्री द्वारा उन्हें इसी मुद्दे पर घेरना आने वाले चुनावों की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। सरकार चाहती है कि भाषाई नियमों का कड़ाई से पालन हो, जबकि विपक्ष इसे अपनी जमीन खिसकने के डर के रूप में देख रहा है। आने वाले दिनों में यह भाषाई रार और बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं।

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