कर्मचारी को 10 साल तक रुलाने वाले अधिकारियों पर गिरी गाज! हाईकोर्ट का ऐसा फैसला जो बन गया मिसाल

Himachal News: सरकारी दफ्तरों का बाबू राज आम आदमी को खूब रुलाता है। इसका एक जीता-जागता उदाहरण हिमाचल प्रदेश में देखने को मिला है। एक कर्मचारी को उसके जायज हक के लिए 10 साल तक भटकाया गया। लेकिन अब न्याय की बड़ी जीत हुई है। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने इस तानाशाही पर कड़ा प्रहार किया है। अदालत ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी है। इसके साथ ही दोषी अधिकारियों पर 5 लाख रुपये का जुर्माना बरकरार रखा है। यह फैसला उन सभी अधिकारियों के लिए कड़ा संदेश है जो सिस्टम के नाम पर लोगों को परेशान करते हैं।

हाईकोर्ट ने लगाई सरकार को कड़ी फटकार

मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की। उन्होंने एकल पीठ के उस फैसले को बिल्कुल सही ठहराया है जिसमें दोषी अधिकारियों पर जुर्माना लगाया गया था। अदालत इस बात पर हैरान रह गई कि अपील 6 ऐसे सेवानिवृत्त अधिकारियों की ओर से दायर की गई थी। इन अधिकारियों ने इसके लिए कोई अधिकार पत्र (पॉवर ऑफ अटॉर्नी) तक जमा नहीं किया था। अदालत ने साफ कहा कि आदेशों की अवहेलना किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं की जाएगी। जब ट्रिब्यूनल का आदेश अंतिम हो चुका था, तो उसका पालन करना राज्य का संवैधानिक कर्तव्य था।

पहले सरकार भरेगी जुर्माना, फिर अधिकारियों से होगी वसूली

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में एक बहुत ही कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने कहा है कि पहले राज्य सरकार 5 लाख रुपये का जुर्माना अदा करेगी। इसके बाद यह पूरी राशि उन दोषी अधिकारियों की जेब से वसूली जाएगी। ये वही अधिकारी हैं जो इस देरी और आदेश की अवहेलना के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार थे। खंडपीठ ने कहा कि पहले भी सरकार को ऐसी हरकतें न दोहराने की चेतावनी दी गई थी। इसके बावजूद सरकार ने फिर से यह भ्रामक अपील दायर कर दी। अदालत ने इसे सीधे तौर पर न्यायपालिका के समय की बर्बादी बताया है।

क्या है गेजम राम के संघर्ष की पूरी कहानी?

यह पूरा विवाद गेजम राम नामक एक कर्मचारी के नियमितीकरण से जुड़ा हुआ है। गेजम राम साल 1994 से ही सरकारी सेवा में कार्यरत थे। सरकारी नियमों के मुताबिक, 8 साल की सेवा के बाद साल 2002 में उन्हें पक्का किया जाना चाहिए था। लेकिन विभाग ने उन्हें साल 2006 से जाकर नियमित किया। साल 2016 में ट्रिब्यूनल ने प्रार्थी के पक्ष में एक साफ आदेश दिया था। ट्रिब्यूनल ने कहा था कि प्रार्थी को 2002 से ही सभी वित्तीय लाभ दिए जाएं। इसके बावजूद, अहंकारी अधिकारियों ने लाभ देने से साफ इनकार कर दिया। अधिकारियों की इसी जिद के बाद यह मामला अवमानना की कार्यवाही तक पहुंच गया था।

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