कुल्लू हादसा: क्या फाइल में सोई अर्जियां ही छीन रही हैं मासूमों की आयु? तंत्र की अनदेखी पर सवाल

Himachal News: हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में एक सूखे पेड़ के गिरने से चार अध्यापिकाओं की दुखद मौत ने प्रशासनिक व्यवस्था की गंभीर खामियों को उजागर कर दिया है। यह हादसा केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि वन विभाग और स्थानीय प्रशासन की भारी लापरवाही का परिणाम है। जब आपदा आती है, तो अधिकारी सक्रियता दिखाकर वाहवाही लूटते हैं, लेकिन पूर्व आपदा प्रबंधन की कमी मासूमों की जान ले रही है। यह विडंबना ही है कि कागजों पर पेड़ चिह्नित होने के बावजूद उन्हें समय पर नहीं काटा गया।

आनी हादसे ने झकझोर दिया प्रदेश का मन

कुल्लू के आनी में स्कूल से घर लौट रही चार अध्यापिकाएं उस वक्त मौत का शिकार हो गईं, जब एक अधजला सूखा पेड़ उनके वाहन पर आ गिरा। इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर खतरनाक घोषित किए गए पेड़ों को काटने में देरी क्यों हो रही है? प्रशासन अब जांच की बात कह रहा है, लेकिन सच यह है कि जांच का खुद ठीक से विश्लेषण होना जरूरी है। यह पेड़ न तो अदृश्य था और न ही एक दिन में सूखा था।

सरकारी नियमों के बावजूद वन निगम की सुस्ती

हिमाचल प्रदेश सरकार ने इसी साल भूमि संरक्षण अधिनियम में संशोधन किया था। इसके तहत हर मंडल में चीड़ के 500 सूखे पेड़ों को काटने का अधिकार वन मंडलाधिकारी को दिया गया है। कुल्लू जिले में ही वन विभाग ने 357 खतरनाक पेड़ों को काटने के लिए चिह्नित किया था। हैरानी की बात यह है कि वन निगम इन पेड़ों को काटना ही भूल गया। साल 2018 से 2025 के बीच अकेले कुल्लू में पेड़ गिरने से 10 मौतें हो चुकी हैं, लेकिन तंत्र ने कोई सबक नहीं लिया।

सिस्टम की प्राथमिकता और फाइलों की गंध

शिमला जैसे शहरों में ट्री कमेटी खतरनाक पेड़ों के भाग्य का फैसला करती है। वहां 400 पेड़ों को काटने की अनुमति मिल चुकी है, लेकिन धरातल पर कार्रवाई शून्य है। प्रशासनिक अधिकारी अक्सर आपदा के बाद ‘रिस्पांस’ यानी राहत कार्य में रुचि दिखाते हैं क्योंकि वहां रील और लोकप्रियता मिलती है। जबकि असली प्रशासन वह है जो पूर्व प्रबंधन से दुर्घटना को होने ही न दे। सरकारी दफ्तरों में खतरनाक पेड़ों की शिकायतें फाइलों में धूल फांक रही हैं, जिसका नतीजा मौत के रूप में सामने आता है।

जब रक्षक ही बन जाएं जान के दुश्मन

वनों से आयु मिलने का नारा देने वाला विभाग अब लोगों की आयु छीनने का कारण बन रहा है। हिमाचल में जिस समय स्थानीय निकाय चुनावों की सरगर्मी तेज है और जातिगत समीकरणों पर विमर्श हो रहा है, वहां चार अध्यापिकाओं की मौत जैसे गंभीर विषय गौण होते दिख रहे हैं। अगर सरकार और प्रशासन ने अधजले और सूखे पेड़ों को लेकर अपनी प्राथमिकताएं नहीं बदलीं, तो आने वाले समय में ऐसे और भी हादसे होने की संभावना बनी रहेगी। अब सक्रियता फाइलों में नहीं, फील्ड में दिखनी चाहिए।

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