पेड़ लगाने के साथ पानी बचाना भी जरूरी, जानिए क्यों फेल हो रहे हैं देश के वृक्षारोपण अभियान

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New Delhi: वैश्विक पर्यावरण संकट के बीच यह समझना बेहद जरूरी हो गया है कि इस धरती पर पानी पहले आया या जंगल? सच यह है कि जल ही जीवन का आधार है और वनों का अस्तित्व पूरी तरह पानी पर टिका है। आज हमने जल और जंगल के इसी प्राकृतिक अंतर्संबंध को भुला दिया है।

यही मुख्य वजह है कि तमाम सरकारी और गैर-सरकारी प्रयासों के बावजूद हमें वनीकरण (अफॉरेस्टेशन) के वांछित और सकारात्मक परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं। आज के नए वनों का मिट्टी और पानी से वह पुराना रिश्ता नहीं रह गया है, जो प्राचीन प्राकृतिक जंगलों का हुआ करता था।

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भारत में प्रति व्यक्ति वन क्षेत्र वैश्विक औसत से बेहद कम, लक्ष्य से पिछड़े राज्य

अगर हम पर्यावरण के मौजूदा आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति बेहद चिंताजनक दिखाई देती है। आज हमारे देश में प्रति व्यक्ति केवल 0.08 हेक्टेयर वन क्षेत्र ही बचा है, जबकि इसका वैश्विक औसत 0.64 हेक्टेयर है। राष्ट्रीय वन नीति के तहत कुल भूभाग का 33 फीसदी हिस्सा वनों से ढका होना चाहिए।

इसके विपरीत, कुछ गिने-चुने राज्यों को छोड़ दें तो कोई भी राज्य इस राष्ट्रीय लक्ष्य के आसपास भी नहीं पहुंच सका है। जमीनी हकीकत यह है कि देश में चलाए जाने वाले बड़े वृक्षारोपण अभियानों में पौधों के जीवित रहने की दर (सर्वाइवल रेट) मात्र 30 से 35 प्रतिशत ही रिकॉर्ड की जा रही है।

कागजी लक्ष्यों को पूरा करने के लिए हो रही रोपाई, प्रजातियों का चयन भी गलत

अक्सर वर्षा ऋतु की अनिश्चितता के बावजूद केवल कागजी टारगेट को पूरा करने के लिए किसी भी मौसम में पौधे रोप दिए जाते हैं। इसके बाद उनकी उचित देखभाल और मॉनिटरिंग नहीं होती। पिछले दो दशकों में करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी परिणाम निराशाजनक रहे हैं क्योंकि पौधों के पनपने के लिए पानी का घोर अभाव है।

इसके साथ ही वृक्षों की प्रजातियों का गलत चुनाव भी एक बड़ी समस्या है। आजकल स्थानीय हवा, मिट्टी और जैव विविधता (बायोडायवर्सिटी) का ध्यान रखे बिना केवल विपरीत हालातों में टिके रहने वाली कमर्शियल प्रजातियों को प्राथमिकता दी जा रही है, जो पर्यावरण के लिए दीर्घकालिक रूप से बिल्कुल भी फायदेमंद नहीं हैं।

‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान से उपजा भावनात्मक जुड़ाव, व्यावहारिक बदलाव की जरूरत

इस संकट के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किया गया ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान एक बेहद संवेदनशील और प्रभावी दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। जब कोई नागरिक अपनी मां के नाम पर पौधा लगाता है, तो वह उससे भावनात्मक रूप से जुड़ जाता है और उसकी सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी उठाता है।

इस जन-आंदोलन को सफल बनाने के लिए अब पेड़ लगाने के साथ-साथ ‘पानी लगाने’ की तकनीक को भी अपनाना होगा। यदि हम हर रोपे गए पौधे के समीप वाटर हार्वेस्टिंग के लिए एक छोटा वैज्ञानिक गड्ढा तैयार करें, तो वर्षा का पानी जमा होकर पौधों की जड़ों को लगातार प्राकृतिक रूप से सींचता रहेगा।

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