Shimla News: हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में सफाई व्यवस्था को लेकर नगर निगम और सैहब कर्मियों के बीच सीधा टकराव शुरू हो गया है। शहर के 677 सैहब कर्मियों ने 15 मई से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने का बिगुल फूंक दिया है। दूसरी ओर, निगम प्रशासन ने भी सख्त रुख अपनाते हुए हड़तालियों पर ‘एस्मा’ (ESMA) लगाने की पूरी तैयारी कर ली है। इस गतिरोध से शहर में गंदगी का साम्राज्य फैलने की आशंका गहरा गई है।
नगर निगम शिमला के कमिश्नर भूपेंद्र अत्री ने स्पष्ट किया है कि सफाई व्यवस्था एक अनिवार्य सेवा है। इसे किसी भी कीमत पर बाधित करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। उन्होंने कहा कि आवश्यक सेवा अनुरक्षण अधिनियम यानी एस्मा लागू करने के लिए जिला दंडाधिकारी को सिफारिश भेजी गई है। एस्मा लागू होने के बाद अगले छह महीने तक कर्मचारी हड़ताल नहीं कर पाएंगे। नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कठोर कानूनी कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।
पुराने कोर्ट आदेशों का हवाला और निगम की वैकल्पिक तैयारी
कमिश्नर अत्री ने याद दिलाया कि वर्ष 2017 में भी ऐसी ही हड़ताल हुई थी, जिस पर अदालत ने कड़ी नाराजगी जताई थी। उन्होंने कहा कि प्रशासन ने शहरवासियों की सुविधा के लिए वैकल्पिक इंतजाम पुख्ता कर लिए हैं। डोर-टू-डोर कूड़ा कलेक्शन प्रभावित होने की स्थिति में आउटसोर्स कर्मियों और नए ठेकेदारों की मदद ली जाएगी। जरूरत पड़ने पर तुरंत टेंडर निकालकर नई भर्तियां की जाएंगी ताकि शहर की स्वच्छता पर कोई बुरा असर न पड़े।
प्रशासन ने आम जनता से भी इस संकट की घड़ी में सहयोग की अपील की है। कमिश्नर ने नागरिकों से अनुरोध किया है कि वे अपना कूड़ा खुद नजदीकी कलेक्शन सेंटर तक पहुंचाएं। निगम का दावा है कि कर्मचारियों की बीमा जैसी जायज मांगें पहले ही पूरी की जा चुकी हैं। ऐसे में हड़ताल का फैसला पूरी तरह तर्कहीन और जनविरोधी है। हालांकि, प्रशासन पूरी कोशिश कर रहा है कि बातचीत के जरिए इस समस्या का समाधान निकाला जा सके।
सीटू का गंभीर आरोप: ‘मजदूरों का गला घोंट रहा है निगम प्रशासन’
दूसरी तरफ, सीटू से संबंधित सैहब सोसाइटी यूनियन ने निगम पर तानाशाही का आरोप लगाया है। यूनियन नेताओं का कहना है कि प्रशासन ने कर्मचारियों की 10 प्रतिशत वार्षिक वेतन वृद्धि रोक दी है। इसकी जगह केवल 3 प्रतिशत महंगाई भत्ता देना मजदूरों के साथ मजाक है। सीटू प्रदेशाध्यक्ष विजेंद्र मेहरा ने कहा कि इस फैसले से हर कर्मचारी को प्रतिमाह एक हजार रुपये तक का आर्थिक नुकसान झेलना पड़ेगा, जो कतई बर्दाश्त नहीं है।
यूनियन ने निगम की फिजूलखर्ची पर भी सवाल उठाए हैं। नेताओं के अनुसार क्यूआर कोड जैसी योजनाओं पर करोड़ों रुपये बर्बाद किए गए, जबकि कर्मचारी भारी बोझ तले दबे हैं। पहले एक सफाई कर्मी पर 80 घरों की जिम्मेदारी थी, जो अब बढ़कर 300 हो गई है। कर्मचारियों को न तो ओवरटाइम मिल रहा है और न ही साप्ताहिक छुट्टियां। यूनियन ने साफ किया है कि जब तक उनकी मांगें नहीं मानी जातीं, संघर्ष जारी रहेगा।

