Delhi News: सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेस यानी सीबीडीटी ने चालू वित्त वर्ष 2026-27 के दौरान इनकम टैक्स रिटर्न की कम्पलसरी स्क्रूटनी (अनिवार्य जांच) के लिए बिल्कुल नई गाइडलाइंस जारी कर दी हैं। ये नए और कड़े नियम उन सभी टैक्सपेयर्स पर सीधे लागू होंगे, जिन्होंने पिछले वित्त वर्ष 2025-26 में अपना रिटर्न दाखिल किया है।
इनकम टैक्स विभाग द्वारा जारी इन नई गाइडलाइंस में बहुत विस्तार से बताया गया है कि विभाग किन पुख्ता आधारों पर और किस कानूनी प्रक्रिया के तहत टैक्सपेयर्स के रिटर्न की बारीकी से गहन जांच करेगा। अगर आप किसी भी तरह की छापेमारी, सर्वे या बड़े टैक्स विवादों के दायरे में आते हैं, तो आपके आईटीआर की जांच होना तय है।
जानिए क्या होता है इनकम टैक्स असेसमेंट और स्क्रूटनी?
टैक्स विशेषज्ञों के अनुसार इनकम टैक्स असेसमेंट का सीधा मतलब यह होता है कि टैक्सपेयर ने अपने रिटर्न में जो भी वित्तीय जानकारी दी है, विभाग उसकी पूरी पुष्टि और समीक्षा करता है। यह जांच मुख्य रूप से दो तरह की होती है। पहली, कम्पलसरी स्क्रूटनी यानी अनिवार्य जांच और दूसरी, रिस्क पैरामीटर्स पर आधारित जांच होती है।
आयकर विभाग हर साल कम्पलसरी स्क्रूटनी के लिए विशेष गाइडलाइंस जारी करता है। राहत की बात यह है कि साल 2025 के मुकाबले इस साल 2026 की गाइडलाइंस में कोई ऐसा बहुत बड़ा या चौंकाने वाला बदलाव नहीं किया गया है, जो आम और ईमानदार टैक्सपेयर्स पर किसी भी तरह का बहुत ज्यादा असर डाले।
इन कारणों से सीधे अनिवार्य जांच के दायरे में आएगा आपका आईटीआर
अगर किसी टैक्सपेयर के व्यापारिक परिसर या घर पर सेक्शन 133A के तहत आयकर सर्वे हुआ है, तो उनका केस अनिवार्य जांच के लिए चुना जा सकता है। इसके अलावा जिन मामलों में आयकर विभाग ने हाल ही में छापेमारी की है या महत्वपूर्ण वित्तीय कागजात जब्त किए हैं, उनकी भी पूरी तरह से अनिवार्य जांच की जाएगी।
इसके साथ ही जिन मामलों में छापेमारी या सर्वे के बाद विभाग द्वारा सेक्शन 148 के तहत विशेष नोटिस जारी किया गया है, उनकी जांच 31 मार्च 2027 तक पूरी होनी तय है। इसके अलावा ऐसे ट्रस्ट या संस्थान जिन्हें टैक्स छूट देने से मना कर दिया गया है, लेकिन फिर भी उन्होंने छूट का दावा किया है, वे भी जांच के दायरे में आएंगे।
मेट्रो शहरों के लिए बदल गया है स्क्रूटनी का यह नियम
अगर पिछले सालों में टैक्सपेयर की आमदनी की गणना में अधिकारियों ने बड़े बदलाव किए थे और वही मुद्दा इस बार भी है, तो स्क्रूटनी का खतरा रहता है। बशर्ते यह विवादित रकम दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे देश के आठ बड़े मेट्रो शहरों में 50 लाख रुपये से ज्यादा और अन्य छोटे शहरों में 20 लाख रुपये से ज्यादा हो।
पहले आठ मेट्रो शहरों के लिए विवादित रकम की यह लिमिट मात्र 25 लाख रुपये तय थी, जिसे अब टैक्सपेयर्स को राहत देते हुए बढ़ाकर सीधे 50 लाख रुपये कर दिया गया है। इसके अलावा अगर किसी अन्य सरकारी रेगुलेटरी एजेंसी या पुलिस से टैक्स चोरी की कोई पुख्ता जानकारी मिलती है, तो विभाग उस रिटर्न की गहन जांच करेगा।
Author: Rajesh Kumar


